Archive | May 2017

आकाशवाणी,पुदुच्चेरी में प्रसारित मेरा भाषण ” महाकवि जयशंकर प्रसाद की कामायनी”

जयशंकर प्रसाद की कामायनी

   हिंदी साहित्य के विशाल सागर में छायावाद युग की रचनाओं में सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में महाकवि जयशंकर प्रसाद जी की कामायनी मानी जाती है । कामायनी हिंदी भाषा का एक महाकाव्य है। प्रौढ़ता के बिन्दु पर पहुँचे हुए कवि की यह अन्यतम रचना है। इसे महाकवि जयशंकर प्रसाद जी के सम्पूर्ण चिंतन- मनन का प्रतिफलन कहना अधिक उचित होगा। इसका प्रकाशन 1936 ई. में हुआ था। हिन्दी साहित्य में आचार्य तुलसीदास जी की ‘रामचरितमानस’ के बाद हिन्दी का दूसरा अनुपम महाकाव्य ‘कामायनी’ को माना जाता है। यह ‘छायावादी युग’ का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है। इसे छायावाद का ‘उपनिषद’ भी कहा जाता है । ‘कामायनी’ के नायक मनु और नायिका श्रद्धा हैं। इस काव्य की कथावस्तु वेद,  उपनिषद, पुराण आदि से प्रेरित है किंतु मुख्य आधार शतपथ ब्राह्मण को स्वीकार किया गया है। आवश्यकतानुसार जयशंकर प्रसाद जी ने पौराणिक कथा में परिवर्तन कर उसे न्यायोचित रूप दिया है।

‘कामायानी’ की कथा वस्तु संक्षेप में इस प्रकार है- पृथ्वी पर घोर जलप्लावन आया और उसमें केवल मनु जीवित रह गये। वे देवसृष्टि के अंतिम अवशेष थे। जलप्लावन समाप्त होने पर उन्होंने यज्ञ आदि करना आरम्भ किया। एक दिन ‘काम पुत्री’ ‘श्रद्धा’ उनके समीप आयी और वे दोनों साथ रहने लगे। भावी शिशु की कल्पना में निमग्न श्रद्धा को एक दिन ईष्यावश मनु अनायास ही छोड़ कर चले गए । उनकी भेंट सारस्वत प्रदेश की अधिष्ठात्री  इड़ा’ से हुई। उसने इन्हें शासन का भार सौंप दिया। पर वहाँ की प्रजा एक दिन इड़ा पर मनु के अत्याचार और आधिपत्य- भाव को देखकर विद्रोह कर उठी। मनु आहत हो गये तभी श्रद्धा अपने पुत्र मानव के साथ उन्हें खोजते हुए आ पहुँची किंतु पश्चात्ताप में डूबे मनु पुन: उन सबको छोड़कर चले गए । श्रद्धा ने मानव को इड़ा के पास छोड़ दिया और अपने मनु को खोजते- खोजते उनसे जा मिली । अंत में सारस्वत प्रदेश के सभी प्राणी कैलास पर्वत पर जाकर श्रद्धा और मनु के दर्शन करते हैं।

‘कामायनी’ की कथा पन्द्रह सर्गों में विभक्त है, जिनका नामकरण चिंता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा आदि मनोविकारों के नाम पर हुआ है। ‘कामायनी’ आदि मानव की कथा तो है ही, पर इसके माध्यम से कवि ने अपने युग के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार भी किया है। कामायनी में मनु मन का प्रतीक है और श्रद्धा हृदय तथा इड़ा बुद्धि का प्रतीक है। अपने आंतरिक मनोविकारों से संघर्ष करता हुआ मनु श्रद्धा याने विश्वास की सहायता से आनन्द लोक तक पहुँचता है। प्रसाद जी ने समरसता सिद्धांत तथा समन्वय मार्ग का प्रतिपादन किया है। अंतिम चार सर्गों में शैवागम का प्रभाव है।

‘कामायनी’ एक विशिष्ट शैली का महाकाव्य है। उसका गौरव उसके युगबोध, परिपुष्ट चिंतन, महत्त्वपूर्ण उद्देश्य और प्रौढ़ शिल्प में निहित है। काव्य रूप की दृष्टि से कामायनी चिंतनप्रधान है, जिसमें कवि ने मानव को एक महान्‌ संदेश दिया है। ‘तप नहीं, केवल जीवनसत्य’ के रूप में कवि ने मानव जीवन में प्रेम की महानता का प्रतिपादन किया है। यह जगत्‌ कल्याणभूमि है, यही श्रद्धा की मूल स्थापना है। इस कल्याणभूमि में प्रेम ही एकमात्र श्रेय और प्रेय है। इसी प्रेम का संदेश देने के लिए कामायनी का अवतार हुआ है। प्रेम मानव और केवल मानव की विभूति है। मानवेतर प्राणी, चाहे वे चिरविलासी देव हों, चाहे असुर हों, चाहे दैत्य या दानव हों, चाहे पशु हों, प्रेम की कला और महिमा वे नहीं जानते, प्रेम की प्रतिष्ठा केवल मानव ने की है। परंतु इस प्रेम में सामरस्य की आवश्यकता है।

युग प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद जी और आचार्य अभिनवगुप्त के काल के बीच लगभग एक हजार वर्ष का अंतर है। यह अंतर भौगोलिक स्तर पर भी है। लेकिन, दोनों में एक अद्भुत साम्य है, वह है उनकी विचार-पीठिका । अभिनवगुप्त का प्रभाव सैकड़ों वर्ष बाद भी जयशंकर प्रसाद जी की कलम से प्रस्फुटित हो रहा है। जयशंकर प्रसाद जी का महाकाव्य ‘कामायनी’ अभिनवगुप्त के ‘प्रत्यभिज्ञा दर्शन’ का ही एक काव्य रूप है। कामायनी ग्रंथ का सार शैव दर्शन के आनंदवाद पर आधारित है। चिंता से आनंद तक पहुंचना कैसे संभव हो, यही कामायनी का मूल प्रतिपाद्य है। कामायनी छायावाद की उत्कृष्ट रचना है। विचारकों का मानना है कि इसका निर्माण छायावाद की प्रौढ़ बेला में हुआ है और यह छायावाद के प्रवर्तक महाकवि जयशंकर प्रसाद की गहन अनुभूति और उन्नत अभिव्यक्ति की साकार प्रतिमा है। इस कारण इसमें छायावाद की संपूर्ण उन्नत और श्रेष्ठ प्रवृत्तियों का मिलना नितांत स्वाभाविक है।

डॉ नगेंद्र ने माना है कि कामायनी परंपरागत महाकाव्य यानी ऐहिक जीवन-प्रधान महाकाव्य की कोटि में नहीं आता। वह ऐहिक जीवन का महाकाव्य नहीं है, मानवचेतना का महाकाव्य है। कामायनी मानव-चेतना के विकास का महाकाव्य है या मानव सभ्यता के विकास का विराट रूपक है। इसलिए इसका अध्ययन साफतौर पर उसके रसास्वादन की प्रक्रिया का एक अंग है। कामायनी के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मानना है कि किसी एक विशाल भावना को रूप देने की ओर भी अंत में प्रसादजी ने ध्यान दिया, जिसका परिणाम है कामायनी, इसमें उन्होंने अपने प्रिय आनंदवाद की प्रतिष्ठा दार्शनिकता के ऊपरी आभास के साथ कल्पना की मधुमती भूमिका बनाकर की है। कामायनी छायावाद की चरम परिणति है और प्रसाद के गंभीर चिंतन का श्रेष्ठतम प्रतिफल है।

मानवता की आधारशिला पर टिका हुआ यह महाकाव्य एक तरफ जहां श्रद्धा और मनु के माध्यम से सृष्टि के विकास की कहानी कहता है, वहीं दूसरी तरफ रूपकों के माध्यम से मानवता के चरम विकास को भी मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक धरातल पर प्रस्तुत करता है। बीसवीं शताब्दी की महान उपलब्धि के रूप में कामायनी दार्शनिक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक और कलात्मक विशिष्टता का एक बेजोड़ संगम है। कामायनी एक सफल कृति है जिसमें जीवन की ज्वलंत समस्याओं का अद्भुत और सटीक समाधान प्रस्तुत किया गया है। कामायनी काव्य का मूलबिंदु है- पहले श्रद्धा को पत्नी रूप में ग्रहण करना। फिर उसे अकेली छोड़कर इड़ा के साथ मनु का रहना। इड़ा को दासी या वंदिनी बनाने का प्रयास करने पर देवों का कोपभाजन बनना।

जीवन का अंतिम भाव आनंद है । आनंद की उपलब्धि के लिए प्रयत्नशील मानव अनेक संघर्षों से गुजरता है। आनंद सर्ग के निर्माण में प्रसादजी ने शैवदर्शन का अत्यधिक आश्रय लिया है। शैवागम के प्रत्यभिज्ञा दर्शन से ही प्रसाद ने समरसता सिद्धांत की परिकल्पना की। शैवदर्शन के अनुसार शिव आनंदस्वरूप हैं। कामायनी में श्रद्धा की शक्ति के रूप में परिकल्पना की गई। कश्मीरी शैवागम प्रधानतया अद्वैतवादी है जहां पर परम अद्वैत सत्ता आत्मा है जिसको शिव परमेश्वर के नाम से भी विभूषित किया जाता है।

महाकवि प्रसाद जी  का ‘आनंदवाद’ सर्ववाद सिद्धांत पर टिका हुआ है जिसे हम वैदिक अद्वैत के रूप में भी समझ सकते हैं। प्रसादजी का यह सर्ववादी सिद्धांत आचार्य शंकर द्वारा प्रवर्तित अद्वैत सिद्धांत से पूर्णतया भिन्न है। उन्होंने शैवागम के सर्ववादमूलक आनंदवाद को ग्रहण किया। आनंदवादी आचार्य अभिनवगुप्त जिस प्रकार एक ही अभेदमय आनंद रस को मूल रस मानते हैं, वैसे ही कामायनीकार की आस्था भी शैवागम के आनंद रस से प्रभावित इसी एकरस सिद्धांत में थी।

महाकवि प्रसादजी मूलत: एक दार्शनिक रहस्यवादी कवि हैं। वे अपनी रचनाओं में इस जीवन के सत्य रहस्य को प्रमुखता से स्वीकार करते हैं। यही रसमय रूप सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उसमें कला और सत्य दोनों की अद्वैतता विद्यमान है। उनका काव्यदर्शन विशुद्ध ध्वनिवादी है। दार्शनिक रहस्य और ध्वनि एक दूसरे पर परस्पर आश्रित हैं। काव्य का अभीष्ट रस आनंद ही है जिसे काव्य की आत्मा भी माना गया है।

अंत में हम कह सकते हैं कि हिंदी भाषा के उद्यान में महाकवि जयशंकर प्रसाद जी एक ऐसे पुष्प हैं जो माधुर्य, सौंदर्य और सुगंध से भरपूर हैं। माधुर्य के कारण उनकी रचनाएँ मिष्ट हैं। सौंदर्य के कारण उनकी रचनाएँ शिष्ट हैं। सुगंध के कारण उनकी रचनाएँ विशिष्ट हैं। माधुर्य, उनकी रचनाओं का शिवम्‌ है। सौंदर्य, , उनकी रचनाओं का सुंदरम्‌ है। सुगंध, , उनकी रचनाओं का सत्यम्‌ है। इस प्रकार इन तीनों का समागम इनकी रचनाओं में देख सकते हैं ।

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