हिंदी दिवस एवं हिंदी पखवाड़ा उद्‍घाटन समारोह में मेरा भाषण

आदरणीय प्राचार्य महोदय! उपप्राचार्य महोदया! शिक्षक-शिक्षिका वृंद ! प्यारे बच्चो ! आप सभी जानते हैं कि आज चौदह सितंबर है । आज के दिन संपूर्ण भारतवासी हिंदी भाषा को सम्मानित करने के लिए हिंदी दिवस मना रहे हैं ।

 

जिसको न जिन गौरव तथा निज देश का अभिमान है, वह नर नहीं, पशु निरा है और मृतक समान है।’कितनी सच बात है यह। अगर हमारे दिल में हमारे देश के लिए, हमारी राष्ट्रभाषा के लिए, गौरव नहीं है, तो हमारा गौरवहीन जीवन है – हम मृतक समान हैं।

अंग्रेजों ने बहुत सालों तक हमारे देश में शासन किया, हमने उनका रहन-सहन देखा, उनकी भाषा हमारे कानों में समाती रही। हमारे नेताओं ने बड़े संघर्ष के बाद अंग्रेजों को भारत से निकलने को मजबूर कर दिया। वे चले गए, परंतु अंग्रेजियत हमारा पीछा नहीं छोड़ती।

हिंदी हमें भावनात्मक एकता से जोड़ती है। राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी हमारे देश की एकता में सबसे अधिक सहायक हो सकती है। फिर भी हम अंग्रेजी के पीछे भागते हैं। यह हमारी कैसी नादानी है?

अपने-अपने प्रांतों और अंचलों की भाषाएं भिन्न हो सकती हैं, परंतु उनका अंग्रेजी से कोई सरोकार है, तो क्या हिंदी से नहीं हो सकता? फिर हिंदी तो एकता का सूत्र है। वैसे भी हम देखते हैं कि कोई भी प्रांत या अंचल हो, हिंदी फिल्में और गीत सभी को अच्छे लगते हैं।

अंग्रेजों के जाने के बाद हमारा गणतंत्र बना, तो 15 सालों तक हिंदी के साथ अंग्रेजी भी चलते रहने की बात हुई थी। बाद में सारा कामकाज सिर्फ हिंदी में होना था। मगर आज स्थिति वैसी की वैसी है। अंग्रेजी हम निकाल नहीं सके। यह राष्ट्रभाषा हिंदी की कैसी अवहेलना है? हम अपनी मां को तो सम्मान न करें और पड़ोसी की मां की सेवा करें- यह कैसा न्याय है?

हमें आत्मचिंतन करना चाहिए कि भला ऐसा क्यों हो रहा है? हमें अपनी राष्ट्रभाषा से प्यार क्यों नहीं है? हिंदी का आदर बढ़ाने के लिए हमें क्या करना चाहिए? हमें विश्वास करना चाहिए कि राष्ट्रभाषा की जगह हिंदी के अलावा अन्य कोई भाषा नहीं ले सकती। यह भाषा समस्त राष्ट्र को एकता के मार्ग पर चला सकती है। हिंदी के विकास में ही देश की उन्नति व विकास समाया हुआ है। हर प्रांत के लोग हिंदी समझ लेते हैं, इसलिए यह भावनात्मक एकता की कड़ी है।

सरकारी कामकाज में हिंदी का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग होना चाहिए। हिंदी की जगह कोई अन्य भारतीय भाषा आंचलिक आधार पर हो सकती है, लेकिन अंग्रेजी का कोई औचित्य नहीं है।

हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, हमारे प्राणों की भाषा है, हमारे दिल की पुकार है। उसे अपनाना हमारा धर्म है। इसे अपनाने से हमारी खुद की गरिमा बढ़ेगी। हम सभी एक-दूसरे के और निकट हो जाएंगे।

हम हिंदी दिवस भला क्यों मनाते हैं? अपने ही देश में अपनी ही भाषा अपनाने के लिए ढिंढोरा पीटना मुनासिब है क्या? हमें बार-बार कहना पड़ता है कि हिंदी को अपनाओ-भला क्यों? झूठे दिखावे व रहन-सहन में अंग्रेजियत ने हमें हिंदी से दूर कर रखा है। आज समय आ गया है, जब हमें हिंदी अपनानी ही होगी। अगर हम खुद अपनी राष्ट्रभाषा का सम्मान नहीं करेंगे, तो विश्व में कोई हमारा भी सम्मान नहीं करेगा। विद्यालय, महाविद्यालय, सरकारी कार्यालय, अदालत सभी जगह रोजमर्रा के कामकाज में हिंदी को पर्याप्त स्थान देना चाहिए। विश्व के उच्चस्तरीय साहित्यों का हिंदी में अनुवाद होना चाहिए।

हिंदी बोलने वालों को हीन भावना से नहीं देखना चाहिए, बल्कि उन्हें सम्मान देना चाहिए। जब यह सब होगा, तभी हम गर्व के साथ कह सकेंगे कि हिंदी हमारी भाषा है-राजभाषा है- राष्ट्रभाषा है। हिंदी सिर्फ हिंदी है। इसका स्थान कोई विदेशी भाषा नहीं ले सकती। यह हमारे देश की एकता की कड़ी है। हमें इसका अभिमान है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की हर भाषा को अमूल्य बताते हुए कहा कि भारत में भाषाओं का अनमोल खजाना है और अगर इन्हें हिंदी से जोड़ा जाए तो मातृभाषा मजबूत होगी।

 

मोदी जी ने 10वें विश्व हिन्दी सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए आगाह किया ‘भाषा की भक्ति बहिष्कृत करने वाली नहीं होनी चाहिए बल्कि यह सम्मिलित करने वाली, सबको जोड़ने वाली होनी चाहिए।’ उन्होंने कहा कि भाषा के दरवाजे बंद नहीं होने चाहिये क्योंकि जब जब ऐसा हुआ है उस भाषा का विकास होने के बजाय उसकी गति मंद ही हुई है।

विकसित हो रही डिजिटल भाषाओं का जिक्र करते हुए मोदी जी ने विशेषज्ञों के हवाले से कहा, ‘आने वाले दिनों में डिजिटल दुनिया में अंग्रेजी, चीनी और हिन्दी का दबदबा बढ़ने वाला है।’ मोदी जी ने कहा कि भारत में भाषाओं का अनमोल खजाना है। इन भाषाओं को हिन्दी से जोड़ने पर राष्ट्रभाषा और ताकतवर होती जायेगी।

आज हमारे भारत की मातृभाषा, राजभाषा हिन्दी का दिवस है , आईये हम सब अपनी इस गौरवशाली राजभाषा और मातृभाषा को विश्व सिंहासन पर आसीन करने का प्रण लें, भारत के माथे के बिंदी हिन्दी में ही केवल यह खासियत है कि वह विश्‍व की हर भाषा के शब्दों को खुद में समेट कर विकसित हुयी है, हर भाषा की मिश्रित भाषा हिन्दी है, समूचे राष्ट्र ही नहीं बल्कि समूचे विश्व को एकसूत्र में जोड़ने की क्षमता से परिपूर्ण दिलों को दिलों से जोड़ने में समृद्ध हिंदी को हम दिल से नमन करें । जय हिंद । जय हिंदी ।

 

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