Archive | March 2015

आकाशवाणी में प्रसारित मेरा भाषण “हरिवंश राय बच्चन जी की कविताएँ”

मिट्टी का तन, मस्ती का मन, क्षण भर जीवन मेरा परिचय’, इन पंक्तियों के मालिक हरिवंश राय “बच्चन जी ”  हैं। इनका जन्म 27 नवंबर 1907 को इलाहाबाद के नज़दीक प्रतापगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव पट्टी में हुआ । हरिवंश राय  “बच्चन जी ”  हिन्दी भाषा के एक प्रसिद्ध  कवि और लेखक  हैं। ‘हालावाद’ के प्रवर्तक बच्चन जी हिन्दी कविता के उत्तर छायावाद काल के प्रमुख कवियों मे से एक हैं।

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,

‘ किस पथ से जाऊँ? ‘ असमंजस में है वह भोलाभाला ।

अलग- अलग पथ बतलाते सब, पर मैं यह बतलाता हूँ –

‘ राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला ॥

ये पंक्तियाँ सबसे प्रसिद्ध कृति मधुशाला से उद्धृत हैं। यह हरिवंश राय बच्चन जी का अनुपम काव्य है। मधुशाला बीसवीं सदी की शुरुआत के हिन्दी साहित्य की अत्यंत महत्वपूर्ण रचना है, जिसमें सूफीवाद का दर्शन होता है। आप भारतीय फिल्म उद्योग के प्रख्यात अभिनेता अमिताभ बच्चन के पिता हैं।

आपको बाल्यकाल में ‘बच्चन’ कहा जाता था जिसका शाब्दिक अर्थ ‘बच्चा’ या संतान होता है। बाद में ये इसी नाम से मशहूर हुए। आपने कायस्थ पाठशाला में पहले उर्दू की शिक्षा ली जो उस समय कानून की डिग्री के लिए पहला कदम माना जाता था । आपने प्रयाग विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम. ए. और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य के विख्यात कवि डब्लू बी यीट्स की कविताओं पर शोध कार्य पूरा करके  पीएच. डी. डिग्री हासिल की |

वर्ष 1955 में कैम्ब्रिज से वापस आने के बाद आप भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त हुए और अपने जीवनकाल में अनेक वर्षों तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में प्राध्यापक रहे और कुछ समय के लिए हरिवंश राय बच्चन जी  आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से संबद्ध रहे।

सन 1926 में हरिवंश राय की शादी श्यामा से हुई।  टीबी की लंबी बीमारी के बाद अल्पायु में श्यामा का देहांत हो गया. सन 1941 में बच्चन ने तेजी सूरी से शादी की। जो रंगमंच तथा गायन से जुड़ी हुई थीं। इसी समय उन्होंने ‘नीड़ का पुनर्निर्माण’ जैसे कविताओं की रचना की। तेजी बच्चन से अमिताभ तथा अजिताभ दो पुत्र हुए। तेजी बच्चन ने हरिवंश राय बच्चन जी  द्वारा शेक्सपियर के अनूदित कई नाटकों में अभिनय का काम किया है।

अल्पायु में बच्चन जी की पहली पत्नी श्यामा का निधन और तेजी बच्चन का अपने जीवन में प्रवेश ये दो घटनाएँ बच्चन के जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण थीं, जो उनकी कविताओं में भी जगह पाती रही । शुरू-शुरू में इन्होंने अपने जीवन में घटित घटनाओं से प्रभावित होकर लिखना शुरू किया। इसकी झलक नीड के पुनर्निर्माण रचना में झलकती है।

एक चिड़िया चोंच में तिनका

लि‌ए जो जा रही है,

वह सहज में ही पवन

उंचास को नीचा दिखाती!

नाश के दुख से कभी

दबता नहीं निर्माण का सुख

प्रलय की निस्तब्धता से

सृष्टि का नव गान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,

नेह का आह्णान फिर-फिर!

सन 1939 में प्रकाशित ‘ एकांत संगीत’ की ये पंक्तियाँ उनके निजी जीवन की ओर ही इशारा करती हैं-

कितना अकेला आज मैं!

संघर्ष में टूटा हुआ,

दुर्भग्‍य से लूटा हुआ,

परिवार से छूटा हुआ,

कितना अकेला आज मैं!

गीतों के इस सौदागर के गीतों में दर्शन, प्रेम और आध्यात्म सहज ही झलक उठते हैं। ‘निशा-निमंत्रण’, ‘प्रणय पत्रिका’, ‘मधुकलश’, ‘एकांत संगीत’, ‘सतरंगिनी’, ‘मिलन यामिनी’, ”बुद्ध और नाचघर’, ‘त्रिभंगिमा’, ‘आरती और अंगारे’, ‘जाल समेटा’, ‘आकुल अंतर’आदि  संग्रहों में आपकी रचनाएँ संकलित हैं।

हालावादी कवि

बच्चन जी हालावादी काव्य के अग्रणी कवि थे।उमर ख़ैय्याम की रूबाइयों से प्रेरित सन 1935 में छपी उनकी मधुशाला ने उन्हें खूब प्रसिद्धि दिलाई। आज भी मधुशाला पाठकों के बीच काफ़ी लोकप्रिय है |

छायावादी काव्य का एक पक्ष स्वच्छंदतावाद प्रखर होकर व्यक्तिवादी-काव्य में विकसित हुआ। इस काव्य में समग्रत: एवं संपूर्णत: वैयक्तिक चेतनाओं को ही काव्यमय स्वरों और भाषा में संजोया-संवारा गया| यह वैयक्तिक कविता आदर्शवादी और भौतिकवादी,दक्षिण और वामपक्षीय विचारधाराओं के बीच का एक क्षेत्र है।”इसे ‘वैयक्तिक कविता’ या ‘हालावाद’  के नाम से अभिहित सकते हैं । इस धारा के प्रमुख कवि हैं- हरिवंशराय बच्चन, भगवतीचरण वर्मा, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, नरेन्द्र शर्मा आदि। इस हालावादी कविता के दो पक्ष स्वीकार किए गए हैं- एक विशुद्ध भौतिक एवं दूसरा आध्यात्मिक। पहले पक्ष के दर्शन हरिवंश राय बच्चन जी की कविता में होते हैं । निस्संदेह हालावादी काव्यधारा के प्रतिनिधि एवं प्रमुख कवि हरिवंश राय बच्चन जी को ही स्वीकार किया जाता है क्योंकि इन्हीं के काव्य में इस काव्यधारा का सर्वाधिक निखरा,प्रखर और प्रभावी स्वरूप दिखाई देता है।

‘बच्चन जी’ की कविता इतनी सर्वग्राह्य और सर्वप्रिय है क्योंकि ‘बच्चन जी’ की लोकप्रियता मात्र पाठकों के स्वीकरण पर ही आधारित नहीं थी। जो कुछ मिला वह उन्हें अत्यन्त रुचिकर जान पड़ा। वे छायावाद के अतिशय सुकुमार्य और माधुर्य से, उसकी अतीन्द्रिय और अति वैयक्तिक सूक्ष्मता से, उसकी लक्षणात्मक अभिव्यंजना शैली से उकता गये थे। ‘बच्चन जी’ ने उस समय मध्यवर्ग के विक्षुब्ध, वेदनाग्रस्त मन को वाणी का वरदान दिया। उन्होंने सीधी, सादी, जीवन्त भाषा और सर्वग्राह्य, गेय शैली में, छायावाद की लाक्षणिक वक्रता की जगह संवेदनासिक्त अभिधा के माध्यम से, अपनी बात कहना आरम्भ किया । उन्होंने अनुभूति से प्रेरणा पायी थी, अनुभूति को ही काव्यात्मक अभिव्यक्ति देना उन्होंने अपना ध्येय बनाया।

बच्चन जी का पहला काव्य संग्रह सन 1935 ई. में प्रकाशित ‘मधुशाला’ से ही माना जाता है। इसके प्रकाशन के साथ ही ‘बच्चन जी’ का नाम एक गगनभेदी रॉकेट की तरह तेज़ी से उठकर साहित्य जगत पर छा गया। ‘मधुशाला’ ‘मधुबाला’ और ‘मधुकलश’-एक के बाद एक, ये तीनों संग्रह शीघ्र ही सामने आ गये हिन्दी में जिसे ‘हालावाद’ कहा गया है। ये उस काव्य पद्धति के धर्म ग्रन्थ हैं। उस काव्य पद्धति के संस्थापक ही उसके एकमात्र सफल साधक भी हुए, क्योंकि जहाँ ‘बच्चन जी’ की पैरोडी करना आसान है, वहीं उनका सच्चे अर्थ में, अनुकरण असम्भव है। अपनी सारी सहज सार्वजनिकता के बावजूद ‘बच्चनजी’ की कविता नितान्त वैयक्तिक, आत्म-स्फूर्त और आत्मकेन्द्रित है।

‘बच्चन जी’ ने इस ‘हालावाद’ के द्वारा व्यक्ति जीवन की सारी नीरसताओं को स्वीकार करते हुए भी उससे मुँह मोड़ने के बजाय उसका उपयोग करने की, उसकी सारी बुराइयों और कमियों के बावज़ूद जो कुछ मधुर और आनन्दपूर्ण होने के कारण गाह्य है, उसे अपनाने की प्रेरणा दी। ख़्याम ने वर्तमान क्षण को जानने, मानने, अपनाने और भली प्रकार इस्तेमाल करने की सीख दी है, और ‘बच्चन जी’ के ‘हालावाद’ का जीवन-दर्शन भी यही है। यह पलायनवाद नहीं है, क्योंकि इसमें वास्तविकता का अस्वीकरण नहीं है, न उससे भागने की परिकल्पना है, प्रत्युत्त वास्तविकता की शुष्कता को अपनी मनस्तरंग से सींचकर हरी-भरी बना देने की सशक्त प्रेरणा है।

बच्चनजी की कुछ जानी अनजानी कविताओं को आज आपके सम्मुख पेश करना चाहता हूँ जिनमें दर्शन भी है और प्रेम भी, एकाकीपन के स्वर है तो दिल में छिपी वेदना का ज्वालामुखी । पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:-

मैंने चिड़िया से कहा

मैं तुम पर एक कविता लिखना चाहता हूँ

चिड़िया ने मुझसे कहा

तुम्हारे शब्दों में मेरे परो सी रंगीनी है ?

मैंने कहा नहीं

तुम्हारे शब्दों में मेरे कंठ का संगीत है ???

नहीं

तूझारे शब्दों में मेरे डैने की उड़ान है ?

नहीं

जान है ??

नहीं तब तुम मुझपर कविता क्या लिखोगे !!!!

मैंने कहा पर मुझे तुमसे प्यार है

चिड़िया बोली

प्यार का शब्द से क्या सरोकार है ।

‘बच्चन जी’ का कवित्व कुछ समयांतर अधिकाधिक अंतमुर्खी होता गया। इस युग और इस ‘मूड’ की कविताओं के संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ (1938 ई.) तथा ‘एकान्त संगीत’ ‘बच्चन जी’ की सम्भवत: सर्वोत्कृष्ट काव्योपलब्धि हैं। वैयक्तिक, व्यावहारिक जीवन में सुधार हुआ। अच्छी नौकरी मिली, ‘नीड़ का निर्माण फिर’ से करने की प्रेरणा और निमित्त की प्राप्ति हुई। ‘बच्चन जी’ ‘ ने अपने जीवन के इस नये मोड़ पर फिर आत्म-साक्षात्कार किया, मन को समझाते हुए पूछा,

जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से,

पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है?

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

”बच्चन जी’ ‘ की कविता की लोकप्रियता का प्रधान कारण उसकी सहजता और संवेदनशील सरलता है और यह सहजता और सरल संवेदना उसकी अनुभूतिमूलक सत्यता के कारण उपलब्ध हो सकी। ”बच्चन जी’ ‘ ने  आरम्भ में केवल आत्मानुभूति, आत्मसाक्षात्कार और आत्माभिव्यक्ति के बल पर काव्य की रचना की। कवि के अहं की स्फूर्ति ही काव्य की असाधारणता और व्यापकता बन गई। समाज की अभावग्रस्त व्यथा, परिवेश का चमकता हुआ खोखलापन, नियति और व्यवस्था के आगे व्यक्ति की असहायता और बेबसी ”बच्चन जी’ ‘ के लिए सहज, व्यक्तिगत अनुभूति पर आधारित काव्य विषय थे। उन्होंने साहस और सत्यता के साथ सीधी-सादी भाषा और शैली में सहज ही कल्पनाशीलता और सामान्य बिम्बों से सजा-सँवार कर अपने नये गीत हिन्दी जगत को भेंट किये। हिन्दी जगत ने उत्साह से उनका स्वागत किया।

सन 1968 में उनकी कृति “दो चट्टाने”  के लिए हिन्दी कविता का साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मनित किया गया था। इसी वर्ष उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा एफ्रो एशियाई सम्मेलन के कमल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। बिड़ला फाउण्डेशन ने उनकी आत्मकथा के लिये उन्हें सरस्वती सम्मान दिया था। बच्चन जी को भारत सरकार द्वारा सन 1976 में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

अंत में हम कह सकते हैं कि हिंदी भाषा के उद्यान में हरिवंश राय बच्चन जी एक ऐसे पुष्प हैं जो माधुर्य, सौंदर्य और सुगंध से भरपूर हैं। माधुर्य के कारण उनकी रचनाएँ मिष्ट हैं। सौंदर्य के कारण उनकी रचनाएँ शिष्ट हैं। सुगंध के कारण उनकी रचनाएँ विशिष्ट हैं। माधुर्य, उनकी रचनाओं का शिवम्‌ है। सौंदर्य, , उनकी रचनाओं का सुंदरम्‌ है। सुगंध, , उनकी रचनाओं का सत्यम्‌ है। इस प्रकार इन तीनों का समागम इनकी रचनाओं में देखते हैं ।

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हिंदी और हम

हिंदी और हम

हिंदी क्यों ?

भाषाओं के उद्यान में हिन्दी ऐसा पुष्प है जो माधुर्य, सौंदर्य और सुगंध से भरपूर है। माधुर्य के कारण हिन्दी मिष्ट है। सौंदर्य के कारण हिन्दी शिष्ट है। सुगंध के कारण हिन्दी विशिष्ट है। माधुर्य, हिन्दी का शिवम्‌ है। सौंदर्य, हिन्दी का सुंदरम्‌ है। सुगंध,हिन्दी का सत्यम्‌ है।

हिंदी की विशेषताएँ

हिन्दी की वर्णमाला में ही वह सामर्थ्य है कि वह संसार की किसी भी बोली और भाषा को ज्यों-का-त्यों लिखित रूप दे सकती है। हिन्दी भाषा मादक है, आकर्षक है और मोहक है। तभी तो रूस के वरान्निकोव और बेल्जियम के बुल्के भारत आकर हिन्दी को समर्पित हो गए। निस्संदेह, हिन्दी में सामर्थ्य की सुगंध है। जैसा बोला जाता है वैसा ही लिखा जाता है। बोले जाने वाले अक्षरों और लिखे जाने वाले अक्षरों में कोई अंतर नहीं होता। उनमें एकरूपता होती है, विविधता नहीं।

हिंदी का भविष्य :

हिंदी भाषा के विकास की गति बेहद उत्साहवर्द्धक है । देश क्या, विदेश क्या, हिंदी क्षेत्र क्या, अहिंदी क्षेत्र क्या हर जगह यह गति पा रही है । अहिंदी भाषी क्षेत्रों और विदेशों में इस विश्वास के कारण हिंदी को सहेजने-संभालने का खूब काम हो रहा है ।