Archive | September 2014

दहेज का दानव

विवाह के समय माता पिता द्वारा अपनी संपत्ति में से कन्या को कुछ धन, वस्त्र, आभूषण आदि देना ही दहेज है| प्राचीन समय में ये प्रथा एक वरदान थी. इससे नये दंपत्ति को नया घर बसाने में हर प्रकार का सामान पहले ही दहेज के रूप में मिल जाता था । माता पिता भी इसे देने में प्रसन्नता का अनुभव करते थे। परंतु समय के साथ साथ यह स्थिति उलट गयी। वही दहेज जो पहले वरदान था अभिशाप बन गया है।आज चाहे दहेज माता पिता के सामर्थ्य में हो ना हो, जुटाना ही पड़ता है। कई बार तो विवाह के लिए लिया गया क़र्ज़ सारी उम्र नहीं चुकता । इसका परिणाम यह निकला कि विवाह जैसा पवित्र संस्कार कलुषित बन गया। कन्याएँ माता पिता पर बोझ बन गयीं और उनका जन्म दुर्भाग्यशाली हो गया । पिता की असमर्थता पर कन्याएँ आत्महत्या तक पर उतारू हो गयीं ।

ऐसी भयावह स्थिति कई दिनों तक नहीं चल सकती थी। अत: सरकार को इसके विरुद्ध कदम उठाने पड़े । आज समाज में जागृति आ रही है । सरकार ने क़ानूनी रूप से दहेज लेने-देने पर प्रतिबंध लगा दिया है। अधिक संख्या में बारात लाना भी अपराध है। दहेज के लिए कन्या को सताना भी अपराध है। परंतु इतना होने पर भी पर्दे के पीछे दहेज चल ही रहा है। उसमे कोई कमी नहीं हुई है। इसके लिया नवयुवकों को स्वयं आगे आकर इस लानत से छुटकारा पाना होगा। साथ ही समाज को भी प्रचार द्वारा अपनी मान्यताएँ बदलकर दहेज के लोभियों को कुदृष्टि से देखकर अपमानित करना चाहिए। इसका अंत तो युध स्तर पर कार्य करके ही किया जा सकता है ।

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आजकल के दोहे

1.

मौसम कैसा भी रहे कैसी चले बयार |

बड़ा कठिन है भूलना पहला-पहला प्यार ||

2.

भारत माँ के नयन दो हिन्दू-मुस्लिम जान |

नहीं एक के बिना हो दूजे की पहचान ||

3.

 बिना दबाये रस न दें ज्यों नींबू और आम

दबे बिना पूरे न हों त्यों सरकारी काम

4.

अमरीका में मिल गया जब से उन्हें प्रवेश

उनको भाता है नहीं अपना भारत देश

5.

जब तक कुर्सी जमे खालू और दुखराम

तब तक भ्रष्टाचार को कैसे मिले विराम

6.

पहले चारा चर गये अब खायेंगे देश

कुर्सी पर डाकू जमे धर नेता का भेष

7.

कवियों की और चोर की गति है एक समान

दिल की चोरी कवि करे लूटे चोर मकान

8.

गो मैं हूँ मँझधार में आज बिना पतवार

लेकिन कितनों को किया मैंने सागर पार

9.

जब हो चारों ही तरफ घोर घना अँधियार

ऐसे में खद्योत भी पाते हैं सत्कार

10.

जिनको जाना था यहाँ पढ़ने को स्कूल

जूतों पर पालिश करें वे भविष्य के फूल

11.

भूखा पेट न जानता क्या है धर्म-अधर्म

बेच देय संतान तक, भूख न जाने शर्म

12.

दोहा वर है और है कविता वधू कुलीन

जब इसकी भाँवर पड़ी जन्मे अर्थ नवीन

13.

गागर में सागर भरे मुँदरी में नवरत्न

अगर न ये दोहा करे, है सब व्यर्थ प्रयत्न

14.

जहाँ मरण जिसका लिखा वो बानक बन आए

मृत्यु नहीं जाये कहीं, व्यक्ति वहाँ खुद जाए

15.

टी.वी.ने हम पर किया यूँ छुप-छुप कर वार

संस्कृति सब घायल हुई बिना तीर-तलवार

16.

दूरभाष का देश में जब से हुआ प्रचार

तब से घर आते नहीं चिट्ठी पत्री तार

17.

आँखों का पानी मरा हम सबका यूँ आज

सूख गये जल स्रोत सब इतनी आयी लाज

18.

करें मिलावट फिर न क्यों व्यापारी व्यापार

जब कि मिलावट से बने रोज़ यहाँ सरकार

19.

रुके नहीं कोई यहाँ नामी हो कि अनाम

कोई जाये सुबह् को कोई जाये शाम

20.

ज्ञानी हो फिर भी न कर दुर्जन संग निवास

सर्प सर्प है, भले ही मणि हो उसके पास

21.

अद्भुत इस गणतंत्र के अद्भुत हैं षडयंत्र

संत पड़े हैं जेल में, डाकू फिरें स्वतंत्र

22.

राजनीति के खेल ये समझ सका है कौन

बहरों को भी बँट रहे अब मोबाइल फोन

23.

राजनीति शतरंज है, विजय यहाँ वो पाय

जब राजा फँसता दिखे पैदल दे पिटवाय

24.

भक्तों में कोई नहीं बड़ा सूर से नाम

उसने आँखों के बिना देख लिये घनश्याम

25.

चील, बाज़ और गिद्ध अब घेरे हैं आकाश

कोयल, मैना, शुकों का पिंजड़ा है अधिवास

26.

सेक्युलर होने का उन्हें जब से चढ़ा जुनून

पानी लगता है उन्हें हर हिन्दू का खून

27.

हिन्दी, हिन्दू, हिन्द ही है इसकी पहचान

इसीलिए इस देश को कहते हिन्दुस्तान

28.

रहा चिकित्साशास्त्र जो जनसेवा का कर्म

आज डॉक्टरों ने उसे बना दिया बेशर्म

29.

दूध पिलाये हाथ जो डसे उसे भी साँप

दुष्ट न त्यागे दुष्टता कुछ भी कर लें आप

30.

तोड़ो, मसलो या कि तुम उस पर डालो धूल

बदले में लेकिन तुम्हें खुशबू ही दे फूल

31.

पूजा के सम पूज्य है जो भी हो व्यवसाय

उसमें ऐसे रमो ज्यों जल में दूध समाय

32.

हम कितना जीवित रहे, इसका नहीं महत्व

हम कैसे जीवित रहे, यही तत्व अमरत्व

33.

जीने को हमको मिले यद्यपि दिन दो-चार

जिएँ मगर हम इस तरह हर दिन बनें हजार

34.

सेज है सूनी सजन बिन, फूलों के बिन बाग़

घर सूना बच्चों बिना, सेंदुर बिना सुहाग

35.

यदि यूँ ही हावी रहा इक समुदाय विशेष

निश्चित होगा एक दिन खण्ड-खण्ड ये देश

36.

बन्दर चूके डाल को, और आषाढ़ किसान

दोनों के ही लिए है ये गति मरण समान

37.

चिडि़या है बिन पंख की कहते जिसको आयु

इससे ज्यादा तेज़ तो चले न कोई वायु

38.

बुरे दिनों में कर नहीं कभी किसी से आस

परछाई भी साथ दे, जब तक रहे प्रकाश

39.

यदि तुम पियो शराब तो इतना रखना याद

इस शराब ने हैं किये, कितने घर बर्बाद

40.

जब कम हो घर में जगह हो कम ही सामान

उचित नहीं है जोड़ना तब ज्यादा मेहमान

41.

रहे शाम से सुबह तक मय का नशा ख़ुमार

लेकिन धन का तो नशा कभी न उतरे यार

42.

जीवन पीछे को नहीं आगे बढ़ता नित्य

नहीं पुरातन से कभी सजे नया साहित्य

43.

रामराज्य में इस कदर फैली लूटम-लूट

दाम बुराई के बढ़े, सच्चाई पर छूट

44.

स्नेह, शान्ति, सुख, सदा ही करते वहाँ निवास

निष्ठा जिस घर माँ बने, पिता बने विश्वास

45.

जीवन का रस्ता पथिक सीधा सरल न जान

बहुत बार होते ग़लत मंज़िल के अनुमान

46.

किया जाए नेता यहाँ, अच्छा वही शुमार

सच कहकर जो झूठ को देता गले उतार

47.

जब से वो बरगद गिरा, बिछड़ी उसकी छाँव

लगता एक अनाथ-सा सबका सब वो गाँव

48.

अपना देश महान् है, इसका क्या है अर्थ

आरक्षण हैं चार के, मगर एक है बर्थ

49.

दीपक तो जलता यहाँ सिर्फ एक ही बार

दिल लेकिन वो चीज़ है जले हज़ारों बार

50.

काग़ज़ की एक नाव पर मैं हूँ आज सवार

और इसी से है मुझे करना सागर पार

51.

हे गणपति निज भक्त को, दो ऐसी निज भक्ति

काव्य सृजन में ही रहे, जीवन-भर अनुरक्ति।

52.

हे लम्बोदर है तुम्हें, बारंबार प्रणाम

पूर्ण करो निर्विघ्न प्रभु ! सकल हमारे काम।

53.

मेरे विषय-विकार जो, बने हृदय के शूल

हे प्रभु मुझ पर कृपा कर, करो उन्हें निर्मूल।

54.

गणपति महिमा आपकी, सचमुच बहुत उदार

तुम्हें डुबोते हर बरस, उनको करते पार।

55.

मातु शारदे दो हमें, ऐसा कुछ वरदान

जो भी गाऊँ गीत मैं, बन जाये युग-गान।

56.

शंकर की महिमा अमित, कौन भला कह पाय

जय शिव-जय शिव बोलते, शव भी शिव बन जाय।

57.

मैं भी तो गोपाल हूँ, तुम भी हो गोपाल

कंठ लगाते क्यों नहीं, फिर मुझको नंदलाल।

58.

स्वयं दीप जो बन गया, उसे मिला निर्वाण

इसी सूत्र को वरण कर, बुद्ध बने भगवान।

59.

गुरु ग्रन्थ के श्रवण से, मिटें सकल त्रयताप

ये मन्त्रों का मन्त्र है, हैं ये शब्द अमाप।

60.

नानक और कबीर-सा, सन्त न जन्मा कोय

दोयम, त्रेयम, चतुर्थम, सब हो गए अदोय।

61.

मीरा ने संसार को, दिया नाचता धर्म

उसके स्वर में है छुपा, वंशीधर का मर्म।

62.

भक्तों में कोई नहीं, बड़ा सूर से नाम

उसने आँखों के बिना, देख लिये घनश्याम

63.

तुलसी का तन धारकर, भक्ति हुई साकार

उनको पाकर राममय, हुआ सकल संसार।

64.

मर्यादा और त्याग का, एक नाम है राम

उसमें जो मन रम गया, रहा सदा निष्काम।

65.

अपना ही हित साधते, सारे देश विशेष

सर्व-भूत-हित-रत सदा, वो है भारत देश।

66.

जो प्रकाश की साधना, करता आठो याम

आभा रत को जोड़कर, बनता भारत नाम।

67.

हमने इक परिवार ही, माना सब संसार

सदा सदा से हम रहे, सभी द्वैत के पार।

68.

आत्मा के सौन्दर्य का, शब्द रूप है काव्य

मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य।

69.

दोहा वर है और है, कविता वधू कुलीन

जब इनकी भाँवर पड़ी, जन्मे अर्थ नवीन।

70.

निर्धन और असहाय थे, जब सब भाव-विचार

दोहे ने आकर किया, उन सबका श्रृंगार।

71.

गागर में सागर भरे, मुँदरी में नवरत्न

अगर न ये दोहा करे, है सब व्यर्थ प्रयत्न।

72.

जो जन जन के होंठ पर, बसे और रम जाय

ऐसा सुन्दर दोहरा, क्यों न सभी को भाय।

73.

झूठी वो अनुभूति है, हुआ न जिसका भोग

बिन इसके कवि-कर्म तो, है बस क्षय का रोग।

74.

दिल अपना दरवेश है, धर गीतों का भेष

अलख जगाता फिर रहा, जा-जा देस विदेश।

75.

ना तो मैं भवभूत हूँ, ना मैं कालीदास

सिर्फ प्रकाशित कर रहा, उनका काव्य प्रकाश।

76.

प्रलय हुई जब-जब हुई, गीतों की लय वक्र

सदा गीत की लय रही, सकल सृष्टि का चक्र।

77.

सरि-सागर-अम्बर-अवनि, सब लय से गतिमान

लय टूटे जब प्राण की, हो जीवन अवसान।

78.

अपनी भाषा के बिना, राष्ट्र न बनता राष्ट्र

वसे वहाँ महाराष्ट्र या, रहे वहाँ सौराष्ट्र।

79.

हिन्दी विन्दी भाल की, उर्दू कुण्डल केश

जब ये दोनों ही सजें, सुन्दर दीखे देश।

80.

गीत वही है सुन जिसे, झूमे सब संसार

वर्ना गाना गीत का, बिलकुल है बेकार।

81.

बड़े जतन के बाद रे ! मिले मनुज की देह

इसको गन्दा कर नहीं, है ये प्रभु का गेह।

82.

अन्तिम घर संसार में, है सबका शमशान

फिर इस माटी महल पर, क्यों इतना अभिमान।

83.

जो आए ठहरे यहाँ, थे न यहाँ के लोग

सबका यहाँ प्रवास है, नदी-नाव संयोग।

84.

रुके नहीं कोई यहाँ, नामी हो कि अनाम

कोई जाये सुबह को, कोई जाये शाम।

85.

रोते-रोते जायँ सब, हँसता जाय न कोय

हँसता-हँसता जाय तो, उसका जनम न होय।

86.

मिटती नहीं सुगंध रे ! भले झरें सब फूल

यही सार अस्तित्व का, यही ज्ञान का मूल।

87.

फल तेरे हाथों नहीं, कर्म है तेरे हाथ

करता चल सत्कर्म तू, सोच न फल की बात।

88.

तन तो एक सराय है, आत्मा है मेहमान

तन को अपना मानकर, मोह न कर नादान।

89.

है गिरने को ही बना, तन का सुन्दर कोट

देख काल है कर रहा, पल-पल इस पर चोट।

90.

श्वेत-श्याम दो रंग के, चूहे हैं दिन-रात

तन की चादर कुतरते, पल-पल रहकर साथ।

91.

बिखरी तो रचना बनी, एक नवीना सृष्टि

सिमटी जब इक बिन्दु में, वही बन गई व्यष्टि।

92.

प्रेय-श्रेय के मध्य है, बस इक झीना तार

प्रेम-वासना मोक्ष सब, हैं इसके व्यापार।

93.

लोभ न जाने दान को, क्रोध न जाने ज्ञान

हो दोनों से मुक्ति जब, हो अपनी पहचान।

94.

चलती चाकी काल की, पिसे सकल संसार,

लिपट गए जो मूठ से, पिसे न एकहु बार।

95.

धन तो साधन मात्र है, नहीं मनुज का ध्येय

ध्येय बनेगा धन अगर, जीवन होगा हेय।

96.

जिस कारण कंदील ये, धरे अनेकों रूप

स्थिर रहती ज्योति वो, हर दम एक स्वरूप।

97.

धरती घूमे कील पर, घूमे किन्तु न कील

ब्रह्म ज्योति सम थिर सदा, माया सम कंदील।

98.

हस्ताक्षर तेरे स्वयम्, भाग्य-नियति के लेख

औरों को मत दोष दे, अपने अवगुण देख।

99.

मिट्टी का विस्तार है, ये सारा संसार

मिट्टी को मत खूँद रे, कर तू इससे प्यार

100.

मिट्टी तो मिटती नहीं, बदले केवल रूप

कभी बने ये कोयला, हीरा कभी अनूप।

101.

दृष्टा दृश्य न भेद कुछ, है मन का भ्रम-जाल

मन को कर ले अमन तो, भेद मिटे तत्काल।

102.

गति-यति का ही नाम है, जनम-मरण का खेल

चलती-रुकती, दौड़ती, जैसे कोई रेल।

103.

तन तो ये साकेत है, और हृदय है राम

श्वास-श्वास में गूँजता, पल-पल उसका नाम।

This entry was posted on 19/09/2014. 1 Comment

हिंदी की अभिलाषा

मैं हूँ हिंदी संपन्न भाषा,

पूरे भारत की राजभाषा,

मानो न मानो, मैं ही राष्ट्रभाषा ।

दुनिया की भाषा बनना मेरी आशा ।

यही मेरी आशा, यही अभिलाषा ॥

 

देश-विदेशों में भारत हो ऊँचा,

सर्वोपरि हो सत्य अहिंसा,

चाहूँगी मैं सभी हिंदी बोलें,

पुरातन ग्रंथों को सभी खोलें,

यही मेरी आशा, यही अभिलाषा ।।

 

सोने की चिड़िया देश हमारा,

सारे मुल्कों में सबसे न्यारा,

विद्रोहियों से इसको बचाओ,

विश्व में शांति का दीया जलाओ।

यही मेरी आशा, यही अभिलाषा।।

 

भारत संस्कृति परिचायिका हूँ,

परदेसियों की संमोहिका हूँ,

भारतवासी, मुझे अपनाओ,

मैं ही सबकी उद्‍धारिका हूँ,

परिचायिका हूँ उद्‍धारिका हूँ।

 

राजनैतिक पर्दा पूरा हटाओ,

निस्वार्थ होकर सोच-विचारो,

हिंदी-सूत्र में प्रांतों को बांधो,

सपनों के भारत को सत्य बनाओ,

यही मेरी आशा, यही अभिलाषा।।

 

आर.बाबूराज जैन

टी.जी.टी. (हिंदी)