आकाशवाणी पुदुच्चेरी द्वारा प्रसारित मेरा भाषण

“छोटा परिवार – सुखी परिवार”

   मानव धरती पर ऐसा प्राणी है जिसने स्वार्थ के वशीभूत होकर प्रकृति का स्वरूप ही बदल दिया है। आज धरती पर उसका ही प्रभुत्व है मानव किसी भी जीव की आबादी जब चाहे बढ़ा सकता है और जब चाहे उसके वजूद को धरती से मिटा सकता है।वनस्पतियाँ अपनी प्राकृतिक प्रजनन व रूप खो चुकी हैं उन्हें पता भी नहीं चलता कि वो कब जवान होकर पेड़ से अलग हो जायेंगी। मानव की बढती आबादी ने जंगलों को ख़त्म कर दिया है।

बढती जनता को रोजगार देने के लिए , जंगलों को खत्म करने के बाद बढता औद्योगिकीकरण अब हमारे गाँव में पैर पसार रहा है।फलस्वरूप कई कम्पनियों की फैक्ट्रियाँ अब गाँव की शुद्ध जलवायु में जहर घोल रही है वहां की उपजाऊ जमीन पर बसी फैक्ट्री अब गेहूँ के दाने नहीं बल्कि कांच की गोलियां पैदा कर रही है। दौड़-धूप वाली इस जिंदगी में हर कोई आगे निकलने की होड़ या अपनी जिम्मेवारियों के दबावों के बीच जी रहा है।

हमारी जिंदगी में खुशियों की कमी नहीं है हमारी भी एक छोटी सी प्यारी सी खुबसूरत सी लाजबाब दुनिया है जिसमें प्यार भरे कई रिश्ते हैं हम खुश नहीं बल्कि बहुत खुश हैं लेकिन जीवन की दौड़ने हमें जीना भुला दिया या यूँ कहे कि खुशियों को पाने की चाहत ने छोटी- छोटी खुशियों पर मुस्कराना भुला दिया । किसी ने जनसंख्या वृद्धि पर अपने विचारों को इन शब्दों में व्यक्त किया है:

जनसंख्या तेजी से बढ़ रही ।

विविध विपदाएँ पैदा कर रही ॥

खाद्द्यान्न संकट खड़ा हो गया,

ऊर्जा संकट बड़ा हो गया,

भुखमरी चारों ओर बढ़ी,

गरीबी की समस्या सामने खड़ी,

जनसंख्या तेजी से बढ़ रही ।

विविध विपदाएँ पैदा कर रही ॥

भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ रहा,

जनता को न्याय नहीं मिल रहा,

जंगल काटे जाते है,

पेड़ न कोई लगाते है,

जनसंख्या तेजी से बढ़ रही ।

विविध विपदाएँ पैदा कर रही ॥

पहले किसी ज़माने में बड़ा परिवार होता था जिसमे रिश्ते -नाते सब एक जुट होते थे सभी दुःख – सुख में एक दूसरे के साथ खड़े होते थे लूले लंगड़े अपाहिज भी पल जाते थे और खुश थे।

आज का सबसे शानदार प्रोग्राम है प्यार करना ,शादी करना कुछ दिनों बाद मन भर गया तलाक लेना- तलाक देना मान लो बच्चे भी तैयार हो गए तो बच्चे अलग,कोई माँ के पास,कोई बाप के पास, बुढ़ापे में बृद्धा आश्रम,शानदार लोकतंत्र ,शानदार परिवार, मर भी गए तो नगरपालिका सरकार और पुलिस है और कोई नहीं तो एन .जी.ओ.हैं और सूचना के आदान प्रदान के लिए अखबार वाले टी.बी.वाले हैं।

आज देश में गरीबों की गरीबी मिटाने के लिए सबसे पहले उनके बड़े बड़े परिवारों को छोटा होना जरूरी है जिससे कि वे अपने बच्चों को जीवन की जरूरी वस्तुएँ उचित प्रमाण से उपलब्ध करा सके।
छोटा परिवार होने से जवाबदारियाँ एवं जरूरतें भी कम होगी और उनको पूर्ण करना आसान होगा । जब खाना-कपडा जैसे प्राथमिक वस्तुएँ जुटाने में आसानी होगी तो शिक्षा का संचार भी आसान होगा।
आधुनिकीकरण एवं परिवर्तनशील युग के दृष्टीकोण से “छोटा परिवार – सुखी परिवार” की लोकोक्ति बिल्कुल सही बैठती है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि संयुक्त परिवार को छोटा किया जाय बल्कि परिवार संयुक्त, छोटा और सुखी हो. आज की बढ़ती हुई महंगाई और ग्लोबल वार्मिंग के समस्याओं को ध्यान में रखते हुए परिवार को सीमित रखना ही समझदारी है. अगर हम और हमारा परिवार छोटा होगा तो हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा-संस्कृति एवं संस्कार दे पायेंगे और स्वयं भी अच्छा स्वास्थ्य-सुख प्राप्त कर सकेंगे।

आज के जमाने में साधन सीमित हैं। बढ़ती हुई वस्तुओं की कीमत एक बडी़ समस्या है. इस कारण अगर परिवार बडा़ है तो हमें अभावग्रस्त जीवन जीना पड़ सकता है और हमारा परिवार अच्छी  शिक्षा-संस्कृति-स्वास्थ्य से वंचित रह सकता है।

अतः हम अपने परिवार को छोटा रखेंगे तो स्वयं एवं बच्चों को सुख-शान्ति और आनन्द के साथ स्वास्थ एवं शिक्षित जीवन व्यतीत कर पायेंगे. इसलिए कहा गया है कि “छोटा परिवार – सुखी परिवार” | देश की बढती आबादी के साथ – साथ गरीबी, बेरोजगारी, तंगी, अपराध, किसानों की आत्महत्या, और हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार भी बढ़ता जा रहा है |

एक जमाने में कहा जाता था छोटा परिवार, सुखी परिवार । अब परिभाषा बदल गई है. नए सर्वे और शोध बताते हैं कि आज के छोटे परिवार भविष्य के धनी परिवार की नींव तैयार करते हैं। लंदन और स्टॉकहोम के वैज्ञानिकों ने इस बात का दावा किया है. और रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने कहा है कि छोटा परिवार अमीरी और संपन्नता की राह तैयार करता है. रिपोर्ट के मुताबिक औद्योगिक रूप से विकसित समाज में कम बच्चे होते हैं. इसका असर ये होता है कि उन्हें विरासत में निवेश करने के लिए ज्यादा संपत्ति प्राप्त होती है. इसका असर सामाजिक और आर्थिक सफलता में दिखाई देता है.

शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने बड़े पैमाने पर परिवारों का अध्ययन किया. इसमें स्टॉकहोम में रहने वाले 14 हजार परिवारों का 1915 से लेकर 1929 तक अध्ययन किया गया. इसके बाद 2009 तक के उनके वंशजों का भी वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया.

अध्ययन में पाया गया कि छोटे परिवार समृद्ध तो थे ही, उन परिवार के बच्चों ने स्कूल, विश्वविद्यालयों में ज्यादा अच्छा प्रदर्शन भी किया था. इन परिवारों का जीवन स्तर भी समाज में ऊंचा था. रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों को तब और लाभ मिला है जब माता पिता का समाजिक स्तर पहले से ही ऊपर होता है.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में मानवविज्ञान पढ़ाने वाले डेविड लॉसन कहते हैं, “अध्ययन के दौरान सबसे दिलचस्प बात ये निकलकर समाने आई कि अगर आप शुरू से ही संपन्न परिवार से आते हैं तो छोटे परिवार का लाभ और ज्यादा मिलता है जबकि गरीब परिवार के पास हासिल करने के लिए कुछ खास नहीं होता. गरीब परिवार के बच्चों की सफलता पूर्वजों की संपत्ति से नहीं, बल्कि समाजिक कारणों से तय होती है.”

ब्रिटेन की रॉयल साइंस पत्रिका में प्रकाशित इस रिपोर्ट में डार्विन के विकासवाद की भी चर्चा की गई है. रिपोर्ट की मुख्य लेखिका अना गुडमैन का कहना है, “विकासवादी जीववैज्ञानिकों के लिए ये एक पहेली है. रिपोर्ट वैसी नहीं है, जैसा कि हम आप उम्मीद करते हैं. जिस प्रजाति के पास जितनी मात्रा में संसाधन होते हैं, वो उतना ही प्रसार करती है. समाजिक आर्थिक मामलों में कम संतान होना सफलता है लेकिन संतानोत्पत्ति के बारे में ये सच नहीं है.” अध्ययन में कहा गया है कि पहली पीढ़ी के पास औसतन 3.4 बच्चे थे जबकि दूसरी पीढ़ी के पास 1.7 बच्चे और तीसरी पीढ़ी की औसत संतानें 1.8 हैं. सबसे कम संतान चौथी पीढ़ी के पास है. इस पीढ़ी के पास संतानों का औसत 0.7 है । ये आंकड़े विदेशों के हैं। भारत के आंकड़े इसके विपरीत कुछ और ही बखान करते हैं।

अधिक जनसंख्या के कारण लोग अपने परिवार को मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध नहीं करवा पाते हैं। देश की ज्यादातर परिवार ऐसे हैं, जिन्हें कई प्रकार की सुविधाओं से वचिंत होना पड़ता है। शिक्षा, बिजली, पानी और चिकित्सा जैसी सुविधाएँ उन्हें समान रूप से नहीं मिल पाती है। इसका सबसे बड़ा कारण है परिवार का बड़ा होना। लोग पुत्र मोह में इतनी संताने उत्पन्न कर देते हैं कि उनकी परवरिश सही प्रकार से नहीं कर पाते हैं। ऐसे परिवार के बच्चे छोटी उम्र में बाल मजदूर बन जाते हैं या फिर चोरी-चकारी करने लग जाते हैं। किसी ने ठीक ही कहा है:

जनसंख्या की वृद्धि के,निकले ये परिणाम ।

जीवन के हर मोड़ पर, कलह और कुहराम॥

पैदा होते प्रति मिनट,नित बच्चे तैंतीस॥

विषम परिस्थति हो गई,क्या होगा हे ईश॥।

श्रोताओ! ऐसी स्थिति से निपटने के लिए आवश्यक है कि लोग अपने परिवार में एक या दो बच्चों का ही भार उठाएँ। उन्हें इतना पढ़ाए लिखाएँ कि वे अपने पैरों पर खड़े होकर सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत करें। परिवार जितना बड़ा होगा घर के मुखिया पर उतना आर्थिक बोझ बढ़ेगा, जो आगे चलकर अंसतोष पैदा करता है। इन बातों पर विचार करने से यह ज्ञात होता है कि परिवार जितना छोटा होता है, उतना जीवन सरल और सुख-सुविधापूर्ण बनता है। बच्चों की शिक्षा अच्छी तरह से हो पाती है। इससे हम अपने परिवार को सुखी बना पाएंगे। उन्हें हर सुख-सुविधा दे पाएंगे तभी तो किसी ने कहा है छोटा परिवार सुखी परिवार। अंत में इस कविता के साथ अपनी बात समाप्त करना चाहता हूँ कविता इस प्रकार है:

हम दो हमारे दो

हमारे दो के सहारे दो,

उन दो के हमारे दो|

फिर उनके भी सपने दो,

सपने ऐसे बढ़ने दो|

बातें सबको कहने दो,

दो.दो.दो.. कहने दो|

7 अरब हो गए भैया,

अब तो बस रहने दो!

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