दोहा-संकलन

दोहा-संकलन

  1. अगनि आंच सहना सुगम, सुगम खडग की धार ।
    नेह निबाहन एक रस, महा कठिन व्यवहार ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि इस संसार में आग की आंच को सहना आसान है, यहाँ तक की व्यक्ति तलवार की धार को भी सह सकता है । पूरे विश्व में यदि कुछ कठिन है तो वो किसी के साथ एक जैसा प्रीत का सम्बन्ध बनाये रखना है क्योंकि वक़्त के अनुसार व्यक्ति के व्यवहार और आचार में परिवर्तन आना प्राक़ृतिक एवं स्वाभाविक है।
  2. करनी बिन कथनी कथे, अज्ञानी दिन रात ।
    कूकर सम भूकत फिरे, सुनी सुनाई बात ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि अज्ञानी एवं मूर्ख व्यक्ति काम कम और बातें अधिक करते हैं और सुनी सुनाई बातों को ही रटते हुए कुत्तों कि तरह हर गली में जा कर भोंकते रहते हैं उनका अपना कोई तर्क नहीं होता है ।
  3. रोष न रसना खोलिए, बरु खोलिअ तरवारि
    सुनत मधुर परिनाम हित बोलिअ बचन बिचारी ।।

    अर्थ: संत शिरोमणि तुलसीदास जी कहते हैं कि क्रोध में कभी भी जुबान नहीं खोलनी चाहिए; इसकी अपेक्षा तलवार निकलना अधिक उचित है । सोच समझकर ऐसे मीठे वचनों का प्रयोग करना चाहिए, जो हितकारी और प्रसन्नता देनेवाले हो ।
  4. चिड़िया चोंच भरि ले गई, घट्यो न नदी को नीर ।
    दान दिये धन ना घटे, कहि गये दास कबीर ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि जिस प्रकार चिड़िया के चोंच भर पानी ले लेने से नदी के जल में कोई कमी नहीं आती है ठीक उसी प्रकार जरूरतमंद को दान देने से किसी के धन में कोई कमी नहीं आती है ।
  5. हेत बिना आवे नहीं, हेत तहां चली जाय ।
    कबीर जल और संतजन, नमे तहां ठहराय ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि यदि प्रेम का सम्बन्ध न हो तो कोई किसी से मिलने भी नहीं जाता है और जहां प्रेम होता है वहाँ दूरी मायने नहीं रखती है । संत कबीर दास जी कहते हैं कि जल एवं साधु कि प्रवृति एक सी ही होती है उन्हें जहां झुकाव नज़र आता है उस ओर निकल पड़ते हैं ।
  6. हेत बिना आवे नहीं, हेत तहां चली जाय ।
    कबीर जल और संतजन, नमे तहां ठहराय ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि यदि प्रेम का सम्बन्ध न हो तो कोई किसी से मिलने भी नहीं जाता है और जहां प्रेम होता है वहाँ दूरी मायने नहीं रखती है । संत कबीर दास जी कहते हैं कि जल एवं साधु कि प्रवृति एक सी ही होती है उन्हें जहां झुकाव नज़र आता है उस ओर निकल पड़ते हैं ।
  7. मन चलता तन भी चले, ताते मन को घेर ।
    तन मन दोनों बस करे, होय राई से मेर ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि मनुष्य का मन जहाँ जाता है तन भी उसी पथ पर चल पड़ता है इसलिए अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक है कि सर्वप्रथम अपने मन को काबू में किया जाए । यदि तन और मन दोनों ही व्यक्ति के नियंत्रण में हो जाएं तो यह राई के समान सामान्य जीवन भी एक पर्वत कि भाँति विशाल एवं सुखद हो जायेगा ।
  8. क्या करिये क्या जोडिये, थोडे जीवन काज ।
    छांडि छांडि सब जात हैं, देह गेह धन राज ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि इस छोटे से जीवन काल को व्यक्ति इसी सोच में व्यर्थ गँवा देता है कि वो क्या क्या संचय कर सकता है जबकि जीवन के अंत में सभी को ये शरीर, घर, धन एवं राज-पाठ सब यहीं पर छोड़ कर ही जाना होता है।
  9. कर बहियां बल आपनी, छांड बिरानी आस ।
    जाके आंगन नदिया बहे, सो क्यों मरे पियास ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि मनुष्य को अपने परिश्रम पर विश्वास रख कर अपना कार्य करना चाहिए, किसी और के आसरे रहने से कुछ प्राप्त नहीं होता है। क्योंकि जिस व्यक्ति को प्यास होती है उसे ही जल का महत्व पता होता है, जिसके पास स्वयं ही नदी हो वो प्यास कि पीड़ा नहीं समझ सकता ।
    भाव यह है कि ज़रूरत मंद को किसी के आसरे न रह कर परिश्रम से अपना कार्य स्वयं करना चाहिए, क्योंकि जिसके भरोसे वह है, हो सकता है कि उसे इसकी आवश्यकता ही न हो ।
  10. एक बुन्द से सब किया, नर नारी का काम ।
        सो तूं अंतर खोजी ले, सकल व्यापक राम ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि ईश्वर ने इस सृष्टि में सभी जीवों को एक ही स्रोत से उत्पन्न किया है भले ही वो कोई भी नर, नारी अथवा पशु हो। यदि तुम चाहो तो अंतर खोजने का प्रयत्न भी कर के देख लो तुम्हे सभी जीवों में राम ही राम व्याप्त नज़र आएंगे।
  11. भक्ति बीज है प्रेम का, परगट पृथ्वी मांहि ।
        कहैं कबीर बोया घना, निपजे कोऊ एक ठांहि ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि भक्ति प्रेम के बीज के सामान है जो कि ह्रदय रूपी धरती पर पैदा होता है, इस बीज को बहुत जगहों पर बोने पर भी एक आद जगह ही इसे अपनी जड़ें फ़ैलाने का अनुकूल वातावरण मिलता है।
  12. दासातन हिरदै नहीं, नाम धरावे दास ।
        पानी के पीये बिना, कैसे मिटे पियास ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि जिसके ह्रदय में लोगो के लिए दया भावना नहीं है उसका नाम ‘दास’ रखने का क्या प्रयोजन, इसके लिए लोगों की पीड़ा को अनुभव करना आवश्यक है । जिस प्रकार पानी को पिए बिना प्यास बुझाना असम्भव है ठीक उसी प्रकार किसी कि पीड़ा को अनुभव किये बिना ह्रदय में उसके प्रति दया भावना का उत्पन्न होना असम्भव है ।
  13. तन की जाने मन की जाने, जाने चित्त की चोरी ।
        वह साहब से क्या छिपावे, जिनके हाथ में डोरी ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि वो तो सर्व व्यापी एवं सर्वज्ञ है उसे तुम्हारे मन में क्या है वो भी पता है, व्यक्ति विश्व से भले ही अपने सभी बुरे कर्मों को छुपा ले परन्तु उस ईश्वर से कभी कुछ नहीं छिपा रहता है जिसके हाथ में सभी जीवों कि प्राण डोर है।
  14. मन राजा मन रंक है, मन कायर मन शूर ।
        शून्य शिखर पर मन रहे, मस्तक पावे नूर ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि किसी व्यक्ति कि मन कि प्रबलता अर्थात उसकी इच्छा शक्ति ही उसे राजा या रंक बनाती है । इच्छा शक्ति की कमी से ही कोई व्यक्ति कायर हो जाता है और कोई इसके बल पर ही शूर-वीर हो कर ख्याति अर्जित करता है । यदि मन कि शक्ति प्रबल हो तो ही मस्तिष्क को ज्ञान रुपी नूर कि प्राप्ति हो सकती है।
  15. खाय पकाय लूटाय ले, करि ले अपना काम ।
        चलती बिरिया रे नरा, संग न चले छदाम ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि हे मनुष्य! तेरे पास जो भी साधन है उसका स्वयं के लिये उपयोग कर (खाय), दूसरों के काम आ सके ऐसी व्यवस्था कर (पकाय), परोपकार के कार्य में लगा (लूटाय ले), अपना जीवन सार्थक कर ले (करि ले अपना काम), क्योंकि संसार से जाते समय (चलती बिरिया) फूटी कौडी भी तेरे साथ नहीं चलेगी (संग न चले छदाम)।
  16. माया का सुख चार दिन, काहे तूं गहे गमार ।
        सपने पायो राजधन, जात न लागे बार ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि व्यक्ति को अपने धन कि नशे में कभी घमंड नहीं करना चाहिए । धन एवं सामर्थ्य का होना मात्र एक स्वप्न कि तरह ही है जो आँखे खुलते ही समाप्त हो जाता है अतः इसके मद में कभी अंधे हो कर मानवता को भूलना अमानविक है ।
  17. दुर्बल को न सताइये, जा की मोटी हाय ।
        बिना जीव की श्वास से, लोह भसम हो जाय ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि शक्तिशाली व्यक्ति को कभी अपने बल के मद में चूर हो कर किसी दुर्बल पर अत्याचार नहीं करना चाहिए क्योंकि दुखी ह्रदय कि हाय बहुत ही हानिकारक होती है । जिस प्रकार लोहार कि चिमनी निर्जीव होते हुए भी लोहे को भस्म करने कि शक्ति रखती है ठीक उसी प्रकार दुःखी व्यक्ति कि बद्दुआओं से समस्त कुल का नाश हो जाता है ।
  18. प्रेम बिना धीरज नहीं, बिरह बिना बैराग ।
        सतगुरु बिना मिटते नहीं, मन मनसा के दाग ॥

    अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि मन में जिसके ह्रदय में प्रेम न हो वह धैर्य का अर्थ भी नहीं समझ सकता है और बिरह कि वेदना को केवल एक बैरागी ही समझ सकता है । जिस प्रकार प्रेम और धीरज एवं बिरह और बैराग का सम्बन्ध होता है उसी प्रकार गुरु और शिष्य के ह्रदय में सम्बन्ध होता है, बिना गुरु के शिष्य के मन से इच्छाओं को कोई और नहीं मिटा सकता है ।

  19. लाभ समय को पलिबो हानि समय कि चूक ।
        सदा बिचरहिं चारुमति सुदिन कुदिन दिन दूक ॥

    अर्थ: संत शिरोमणि तुलसीदास जी कहते हैं कि समय का पालन करना सदैव लाभप्रद होता है, जबकि सही समय को चूक जाना हानिकारक ही होता है । इसीलिए बुद्धिमान व्यक्ति इस बात को सदा अपने विचार में रखता है कि अच्छा और बुरा समय मात्र दो दिन के लिए ही होता है ।
  20. लाभ समय को पलिबो हानि समय कि चूक ।
    सदा बिचरहिं चारुमति सुदिन कुदिन दिन दूक ॥

    अर्थ: संत शिरोमणि तुलसीदास जी कहते हैं कि समय का पालन करना सदैव लाभप्रद होता है, जबकि सही समय को चूक जाना हानिकारक ही होता है । इसीलिए बुद्धिमान व्यक्ति इस बात को सदा अपने विचार में रखता है कि अच्छा और बुरा समय मात्र दो दिन के लिए ही होता है ।

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