Archive | April 2013

आकाशवाणी, पुदुच्चेरी द्वारा प्रसारित मेरा भाषण

तुलसीदास के भजन

    कलम में बडी शक्ति होती है. यह सब जानते हैं लेकिन यह शक्ति आज से ही नहीं है बल्कि प्राचीन काल से है। कलम एक आम आदमी को भी संतों की श्रेणी में खड़ा कर देती है। भक्ति, भाव और कलम के मिलन ने भारत को कई संत, विद्वान और कवि दिए हैं जिन्होंने समय-समय पर देश की संस्कृति को अलंकृत किया है। ऐसे ही एक महान संत और कवि थे राम भक्त ‘श्रीरामचरितमानस’ के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास |  वे एक महान कवि होने के साथ साथ पूजनीय भी हैं।

   हिन्दी साहित्य जगत के विस्तृत नभ में कवि गोस्वामी तुलसीदास एक ऐसे सितारे हैं जिनकी रोशनी से नभ-मंडल प्रकाशित है। गोस्वामी तुलसीदास का नाम आते ही लोग “रामचरित मानस” को याद करते हैं । गोस्वामी तुलसीदास रचित “हनुमान चालीसा को पढ़ने मात्र से भय का नाश हो जाता है. ऐसे महान कवि वास्तव में हिन्दी साहित्य जगत के अग्रणी कवि और शिरोमणि हैं।

गोस्वामी तुलसीदासजी हिन्दी भाषा के तो सर्वश्रेष्ट कवि है ही , संसार भर में वे सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रतिष्टित व्यक्तित्त्व भी है ! उनका सबसे महान ग्रंथ ‘राम चरित मानस ‘ है , जिसकी चौपाई और दोहे शिलालेख और शुभाषित, पुष्प बन गए हैं ! उन्होंने जनता के मनोराज्य में रामराज्य के आदर्श को सदा के लिए प्रतिष्टित कर दिया है ! किसान का कच्चा मकान हो या आलिशान राजमहल , गृहस्थ का घर हो या महात्मा का आश्रम , देश हो , या विदेश , सर्वत्र ‘राम चरित्र मानस ‘ हिन्दी भाषा का सर्वोत्तम और सर्वमान्य पवित्र -ग्रन्थ माना जाता रहा है ! गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘राम -चरित मानस ‘ जनमानस में , राम -भक्ति का कमल खिलानेवाले सूर्य के समान प्रकाशित रहा है ! “

  श्रीमद भागवत गीता के बाद दूसरे स्थान पर भारतीय जन मानस को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला अगर कोई ग्रंथ है वह है रामचरितमानस | श्रीमद भागवत गीता और रामचरितमानस ये दोनों ग्रंथ  सर्वाधिक लोकप्रिय  हैं|
जिनके तन और मन में राम हों वहीं रामचरितमानस जैसे भक्ति रस से परिपूर्ण ग्रंथ की रचना कर सकते हैं| इसलिए उनके गुरु ने बचपन में ही उनका नाम रामबोला रख दिया था|
तुलसीदास जी का जन्म संवत 1554 श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजपुर गाँव में हुआ| इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी देवी था| बारह महीने तक गर्भ में रहने के पश्चात गोस्वामी तुलसीदासजी का जन्म हुआ। तुलसी की पूजा के फलस्वरुप उत्पन्न पुत्र का नाम तुलसीदास रखा गया। आप की शारीरिक ढ़ांचा पांच वर्ष के बालक जैसी थी| सामान्यता प्रत्येक बच्चा रोते हुए जन्म लेता है परन्तु इस विलक्षण बालक ने रोने की बजाए “राम” शब्द का उच्चारण किया था| कहा जाता है कि जन्म के समय इनके मुख में पूरे बत्तीस दांत थे|
इस विचित्र बालक की विलक्षणता को लेकर माता-पिता को अनिष्ट की आशंका हुई| उन्होंने तब अपने बालक को अपनी सेविका चुनिया को सौंप दिया| वह उसे अपने ससुराल ले गई| जब तुलसीदास जी साढे पांच वर्ष के हुए तो चुनिया इस संसार को छोड़कर चली गई| वे गली-गली भटकते हुए अनाथों की तरह जीवन जीने को विवश हुए। बचपन में इतनी परेशानियां और मुश्किलें झेलने के बाद भी तुलसीदास जी ने कभी भगवान का दामन नहीं छोडा और उनकी भक्ति में हमेशा लीन रहे. बचपन में उनके साथ एक और घटना घटी जिसने उनके जीवन को एक नई दिशा दी ।  इस बालक पर अनंतानंद जी के शिष्य नरहरि आनन्द की दृष्टि पड़ी| वे तुलसीदास जी को अपने साथ अयोध्या ले गए| उन्होंने ही उनका नाम रामबोला रखा| 21 वर्ष की आयु में तुलसीराम का विवाह यमुना के पार स्थित एक गांव की अति सुन्दरी भारद्वाज गोत्र की कन्या रत्नावली से कर दी गई |
तुलसीदास जी अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे| वे अपनी पत्नी का विछोड़ा एक दिन के लिए भी सहन नहीं कर सकते थे| एक बार उनकी पत्नी उनको बताए बिना मायके आ गई| तुलसीदास जी उसी रात छिपकर ससुराल पहुँच गए| इससे उनकी पत्नी को अत्यंत संकोच हुआ उसने तुलसीदास जी से कहा –

हाड़ माँस को देह मम, तापर जितनी प्रीति।

तिसु आधो जो राम प्रति, अवसि मिटिहि भवभीति।।

अर्थात मेरा शरीर तो हाडमास का पुतला है| जितना तुम इस शरीर से प्रेम करते हो यदि उससे आधा भी भगवान श्री राम जी से करोगे तो इस संसार के माया जाल से मुक्त हो जाओगे| तुम्हारा नाम अमर हो जाएगा|”
तुलसीदासजी के जीवन को इस दोहे ने पलटकर रख दिया। उनके मन में इस बात का  इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि वे उसी क्षण वहाँ से निकाल पड़े और उसी समय से वे प्रभु राम की वंदना में जुट गए। इसके बाद तुलसीराम को तुलसीदास के नाम से पुकारा जाने लगा। वे भारत के तीर्थ स्थलों के दर्शन करते हुए अपने गांव राजापुर पहुंचे जहां उन्हें यह पता चला कि उनकी अनुपस्थिति में उनके पिता भी नहीं रहे और पूरा घर नष्ट हो चुका है तो उन्हें और भी अधिक कष्ट हुआ. उन्होंने विधि-विधान पूर्वक अपने पिता जी का श्राद्ध किया और गाँव में ही रहकर लोगों को भगवान राम की कथा सुनाने लगे। कहते हैं कि हनुमान जी की कृपा से उन्हें भगवान राम जी के दर्शन हुए और उसके बाद उन्होंने अपना सारा जीवन राम जी की महिमा में लगा दिया| कहा जाता है कि भगवान राम की इच्छानुसार उन्होंने ‘रामचरितमानस’ की रचना की थी । तुलसीदास जी के संबंध में एक कथा प्रचलित हैं एक बार तुलसीदास जी रात में जंगल से गुजर रहे  थे। उन्हें चोरों ने घेर लिया। उनके सरदार ने  तुलसीदास जी से पूछा -तू कौन है ? इधर  क्यों आया है ? सारे चोर मिलकर तुलसीदास जी  को डराने – धमकाने लगे। लेकिन वे  जरा भी नहीं डरे। उन्हें इस तरह निडर देख  चोरों ने सोचा कि अगर यह साधारण  व्यक्ति होता तो भाग जाता। जरूर यह भी हमारे  जैसा ही है। चोरों ने उन्हें  अपना साथी बना लिया।  तुलसीदास जी उनके साथ चल पड़े। चोर चोरी करने के  लिए एक घर में घुसने लगे। उन्होंने तुलसीदास जी से  कहा – ऐ नए चोर ! देख, हम लोग भीतर घुसते हैं।  अगर कोई आए तो तू आवाज लगा देना। तुलसीदास जी  ने स्वीकृति में सिर हिला दिया।  चोर ज्यों ही चोरी करने के लिए घर में घुसे ,  त्यों ही तुलसीदास जी ने अपने झोले से शंख निकालकर  बजा दिया। सब चोर भागकर आ गए। पूछने पर  तुलसीदास जी  बोले – आपने ही तो कहा था कि कोई  देखे तो आवाज लगा देना। आवाज करता तो कोई  मेरा गला दबा देता। इसलिए शंख बजा दिया।  चोर बोले – परंतु यहां तो कोई नहीं हैं जो हमें  देखता? तुलसीदास जी बोले – जो सर्वव्यापक हैं ,  सर्वत्र हैं , जो मेरे हृदय में विराजमान हैं ,  वही आप लोगों के हृदय में भी विराजमान हैं , मुझे  लगा कि जब सब जगह श्रीराम हैं तो वे आप  लोगों को भी देख रहे हैं , वे आप  लोगों को सजा देंगे। कही आप लोगों को सजा न  मिल जाए इसलिए मैंने शंख बजा दिया।  तुलसीदास जी के वचन सुनकर चोरों का मनपलट  गया और वे सदा के लिए चोरी का धंधा छोड़कर  प्रभु के भक्त बन गए।

इससे पता चलता है कि उनके मन में भगवान के प्रति अगाध प्रेम एवं विश्वास था और उनके मन की बात होंठों में आती थी और वे ही भजन के रूप धारण करते थे।तुलसीदास जी के मन में स्वभावत: आध्यात्मिक भावना एवं राम भक्ति परिपूर्ण थी । तुलसीदास जी का काव्य लेखन केवल रामचरितमानस तक ही सीमित न रहा| इन्होने कवितावली, दोहावली, गीतावली व विनय पत्रिका जैसी रचनाएँ भी लिखी हैं| इनका लेखन अवधी व ब्रज भाषा दोनों में मिलता है| जन मानस को अधिक प्रभावित करने वाला ग्रंथ रामचरितमानस की रचना लोक भाषा में हुई|

विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी काशी में भजन की परम्परा का श्रीगणेश  राम चरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसी दास जी ने की थी। काशी में भजन की व्यावहारिक परम्परा कब शुरु हुई इस पर विवाद था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय राजनीतिशास्त्र विभाग के प्रोफेसर कौशल किशोर मिश्र ने अपने शोध से इस विवाद को लगाम लगा दिया है। प्रो. मिश्र ने अपने शोध में पाया है कि तुलसीदास जी शास्त्रीय संगीत के मर्मज्ञ थे । वे राग, ताल,अलाप और स्वर को साधना जानते थे। उन्होंने महाकाव्य के अतिरिक्त  रागों में भजन का निर्माण किया। तुलसीदासजी ने अपनी भक्ति के माध्यम से शास्त्रीय संगीत को नया आयाम दिया। उनका भजन  पूरी तरह ईश्वर को समर्पित था और निर्गुण एवं सगुण दोनों ही रूपों में था।

तुलसीदासजी द्वारा रचित रागों में बद्ध भजन यह स्पष्ट करते हैं कि काशी में उनके युग में शास्त्रीय संगीत की परम्परा स्थापित हो चुकी थी। प्राप्त रिकार्डों से पता चलता है कि सन् 1700 में काशी में कई संगीतकार थे और संगीत की साधना होती थी । सन 1740  के एक भजन संग्रह जिसे पं.राममूर्ति ने संकलित किया था,  उसमें लिखा है कि सभी भजनों पर तुलसीदासजी और भारतीय सांस्कृतिक साहित्य का प्रभाव था। बहुत से ऐसे रागों में उन्होंने भजन संग्रहित किये जो आज दुर्लभ है। तुलसीदासजी  के समय में संकटमोचन और विश्वनाथ मंदिर शास्त्रीय संगीत के केन्द्र थे। तुलसी मंदिर में शास्त्रीय संगीत की चौपाल लगती थी और भजन  के साथ भांग, पान और ठंडई जमती थी। काशी संगीत परम्परा का उदगम स्थल तुलसीदास जी द्वारा स्थापित संकटमोचन मंदिर था ।

“और नहीं कुछ काम के” यह भजन महात्मा गांधी को अत्यंत प्रिय था. इसी कारण उन्होंने इस गीत को अपनी आश्रम भजनावली में शामिल किया था. यह भजन सायंकालीन प्रार्थना के समय नारायण मोरेश्वर खरे उन्हें सुनाया करते थे. कभी-कभी महात्मा गांधी उसके अर्थ सहित व्याख्या भी किया करते थे.

और नहीं कुछ काम के,

मैं राम भरोसे अपने राम के,

और नहीं कुछ काम के,

दोऊ अक्षर सब कुल तारे,

वारी जाऊं उस नाम पे,

और नहीं कुछ काम के,

तुलसीदास प्रभु राम दयाधन,

और देव सब दामके,

और नहीं कुछ काम के.

तुलसीदास जी अपनी कृतियों के माध्यम से लोकाराधन, लोकरंजन और लोकसुधार का प्रयास किया और रामलीला का सूत्रपात करके इस दिशा में अपेक्षाकृत और भी ठोस कदम उठाया। गोस्वामी जी का सम्मान उनके जीवन-काल में इतना व्यापक हुआ कि अब्दुर्रहीम खानखाना एवं टोडरमल जैसे अकबरी दरबार के नवरत्न, मधुसूदन सरस्वती जैसे अग्रगण्य शैव साधक, नाभादास जैसे भक्त कवि आदि अनेक समसामयिक विभूतियों ने उनकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की। उनके द्वारा प्रचारित राम और हनुमान की भक्ति भावना का भी व्यापक प्रचार उनके जीवन-काल में ही हो चुका था।

काव्य-गगन के सूर्य तुलसीदास ने अपने अमर आलोक से हिन्दी साहित्य-लोक को सर्वभावेन दैदीप्यमान किया। उन्होंने काव्य के विविध स्वरूपों तथा शैलियों को विशेष प्रोत्साहन देकर भाषा को खूब संवारा और शब्द-शक्तियों, ध्वनियों एवं अलंकारों के यथोचित प्रयोगों के द्वारा अर्थ क्षेत्र का अपूर्व विस्तार भी किया। उनकी साहित्यिक देन भव्य कोटि का काव्य होते हुए भी उच्चकोटि का ऐसा शास्र है, जो किसी भी समाज को उन्नयन के लिए आदर्श, मानवता एवं आध्यात्मिकता की त्रिवेणी में अवगाहन करने का सुअवसर देकर उसमें सत्पथ पर चलने की उमंग भरता है।

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