Archive | October 2012

आकाशवाणी में मेरा भाषण

महादेवी वर्मा की कविता
महादेवी वर्मा हिन्दी भाषा की प्रख्यात कवयित्री हैं। इनकी गिनती हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभ सुमित्रानन्दन पन्त, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के साथ की जाती है। आधुनिक हिन्दी कविता में महादेवी वर्मा एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरीं। इन्होंने खड़ी बोली हिन्दी को कोमलता और मधुरता से संसिक्त कर सहज मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का द्वार खोला, विरह को दीपशिखा का गौरव दिया, व्यष्टि मूलक मानवतावादी काव्य के चिंतन को प्रतिष्ठापित किया। इनके गीतों का नाद-सौंदर्य, पैनी उक्तियों की व्यंजना शैली अन्यत्र दुर्लभ है।
महादेवी जी अपने परिवार में कई पीड़ियों के बाद उत्पन हुई। इनके परिवार में दौ सो सालों से कोई लड़की पैदा नहीं हुई थी, यदि होती तो उसे मार दिया जाता था। आपके दादा फ़ारसी और उर्दू तथा पिताजी अंग्रेज़ी जानते थे। माताजी जबलपुर से हिन्दी सीख कर आई थी, इन्होंने पंचतंत्र और संस्कृत का अध्ययन किया। इनको काव्य प्रतियोगिता मे चांदी का कटोरा मिला था। जिसे इन्होंने गाँधीजी को दे दिया था। महादेवी वर्मा कवि सम्मेलन में भी जाने लगी थी, वो सत्याग्रह आंदोलन के दौरान कवि सम्मेलन में अपनी कवितायें सुनाती और उनको हमेशा प्रथम पुरस्कार मिला करता था। महादेवी जी मराठी मिश्रित हिन्दी बोलती थी।
महादेवी जी छायावाद रहस्यवाद के प्रमुख कवियों में से एक हैं। हिन्दुस्तानी स्त्री की उदारता, करुणा, सात्विकता, आधुनिक बौद्धिकता, गंभीरता और सरलता इनके व्यक्तित्व में समाविष्ट थी। इनके व्यक्तित्व और कृतित्व की विलक्षणता से अभिभूत रचनाकारों ने इन्हें ‘साहित्य साम्राज्ञी, हिन्दी के विशाल मंदिर की वीणापाणि’, ‘शारदा की प्रतिमा’ आदि विशेषणों से अभिहित करके इनकी असाधारणता को लक्षित किया। इन्होंने एक निश्चित दायित्व के साथ भाषा, साहित्य, समाज, शिक्षा और संस्कृति को संस्कारित किया। कविता में रहस्यवाद, छायावाद की भूमि ग्रहण करने के बावज़ूद सामयिक समस्याओं के निवारण में इन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई।
1919 में इलाहाबाद में क्रास्थवेट कॉलेज से शिक्षा का प्रारंभ करते हुए इन्होंने 1932 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। तब तक इनके दो काव्य संकलन ‘नीहार’ और ‘रश्मि’ प्रकाशित होकर चर्चा में आ चुके थे। महादेवी जी में काव्य प्रतिभा सात वर्ष की उम्र में ही मुखर हो उठी थी। विद्यार्थी जीवन में ही इनकी कविताएँ देश की प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाने लगीं थीं।
उन दिनों के प्रचलन के अनुसार इनका विवाह छोटी उम्र में ही हो गया था परन्तु महादेवी जी को सांसारिकता से कोई लगाव नहीं था अपितु ये तो बौद्ध धर्म से बहुत प्रभावित थीं और स्वयं भी एक बौद्ध भिक्षुणी बनना चाहतीं थीं। विवाह के बाद भी इन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी। इनकी शादी 1914 में डॉ. स्वरूप नरेन वर्मा के साथ इंदौर में 9 साल की उम्र में हुई, ये अपने माता पिताजी के साथ रहती थीं क्योंकि इनके पति लखनऊ में पढ़ रहे थे।
शिक्षा और साहित्य-प्रेम महादेवी जी को एक तरह से विरासत में मिला था। इनमें काव्य रचना के बीज बचपन से ही विद्यमान थे। छ: सात वर्ष की अवस्था में भगवान की पूजा करती हुयी माँ पर उनकी तुकबन्दी:
ठंडे पानी से नहलाती
ठंडा चन्दन उन्हें लगाती
उनका भोग हमें दे जाती
तब भी कभी न बोले हैं
मां के ठाकुर जी भोले हैं।
वे हिन्दी के भक्त कवियों की रचनाओं और भगवान बुद्ध के चरित्र से अत्यन्त प्रभावित थी। इनके गीतों में प्रवाहित करुणा के अनन्त स्रोत को इसी कोण से समझा जा सकता है। वेदना और करुणा इनके गीतों की मुख्य प्रवृत्ति है। असीम दु:ख के भाव में से ही इनके गीतों का उदय और अन्त दोनों होता है।
महादेवी वर्मा पाठशाला में हिन्दी-अध्यापक से प्रभावित होकर ब्रजभाषा में समस्या पूर्ति भी करने लगीं। फिर तत्कालीन खड़ी बोली की कविता से प्रभावित होकर खड़ी बोली में रोला और हरिगीतिका छन्दों में काव्य लिखना प्रारम्भ किया। उसी समय माँ से सुनी एक करुण कथा को लेकर सौ छन्दों में एक खण्डकाव्य भी लिख डाला। 1932 में इन्होंने महिलाओं की प्रमुख पत्रिका ‘चाँद’ का कार्यभार सँभाला। प्रयाग में अध्यापन कार्य से जुड़ने के बाद हिन्दी के प्रति गहरा अनुराग रखने के कारण महादेवी जी दिनों-दिन साहित्यिक क्रियाकलापों से जुड़ती चली गईं। इन्होंने न केवल ‘चाँद’ का सम्पादन किया वरन् हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयाग में ‘साहित्यकार संसद’ की स्थापना की। इन्होंने ‘साहित्यकार’ मासिक का संपादन किया और ‘रंगवाणी’ नाट्य संस्था की भी स्थापना की।
सन 1930 में प्रथम काव्य संग्रह के रूप में “नीहार” प्रकाशित हुआ। इसके दो साल के बाद आध्यात्मिकता से ओतप्रोत ’रश्मि” नामक रचना प्रकाशित हुई। सन्‍ 1935 में महादेवी वर्मा की जीवन दृष्टि का विकसित रूप “नीरजा” नामक काव्य संग्रह में व्यक्त हुआ है। एक साल के बाद इनके द्वारा रचित “सांध्यगीत” प्रकाशन में आया। जिसमें मिलनोत्कंठा से ओत-प्रोत गीतों का समागम है। इनके गीतों में रहस्य भावना का मधुर संस्पर्श है जिसका साक्षात अनुभव इनके द्वारा रचित “दीपशिखा” पढ़ने से मालुम होता है। “यामा” नामक रचना में भावसाम्य से युक्त गीतों तथा चित्रों का अभिनव संग्रह है। इन्होंने ऋग्वेद के मंत्रों का हिंदी में काव्यानुवाद करके सप्तपर्णा नामक रचना के रूप में प्रकाशित की।
महादेवी जी का कुछ प्रारंभिक कविताएँ ब्रजभाषा में हैं, किंतु बाद का संपूर्ण रचनाएँ खड़ी बोली में हुई हैं।महादेवी जी की खड़ी बोली संस्कृत-मिश्रित है। वह मधुर कोमल और प्रवाह पूर्ण हैं। उसमें कहीं भी नीरसता और कर्कशता नहीं। भावों को मूर्त रूप देने में महादेवी जी अत्यंत कुशल थीं। इन्होंने अपनी कविताओं में प्रतीकों और संकेतों का आश्रय अधिक लिया है। अतः इनकी शैली कहीं-कहीं कुछ जटिल और दुरूह हो गई है और पाठक को कविता का अर्थ समझने में कुछ परिश्रम करना पड़ता है।
समस्त मानव जीवन को वे निराशा और व्यथा से परिपूर्ण रूप में देखती थीं। महादेवी जी अपने को नीर भरी बदली के समान बतलाती –
मैं नीर भरी दुख की बदली।
विस्तृत नभ का कोई कोना,मेरा न कभी अपना होना।
परिचय इतना इतिहास यही- उमड़ी थी कल मिट आज चली।
महादेवी जी के प्रेम वर्णन में ईश्वरीय विरह की प्रधानता है। इन्होंने आत्मा की चिरंतन विकलता और ब्रह्म से मिलने की आतुरता के बड़े सुंदर चित्र संजोए हैं-
मैं कण-कण में डाल रही अलि आँसू के मिल प्यार किसी का।
मैं पलकों में पाल रही हूँ, यह सपना सुकुमार किसी का।
प्रकृति चित्रण – अन्य रहस्यवादी और छायावादी कवियों के समान महादेवी जी ने भी अपने काव्य में प्रकृति के सुंदर चित्र प्रस्तुत किए हैं। इन्हें प्रकृति में अपने प्रिय का आभास मिलता है और उससे इनके भावों को चेतना प्राप्त होती है।
महादेवी जी अपने प्रिय को रिझाने के लिए प्रकृति के उपकरणों से अपना श्रृंगार करती हैं-
शशि के दर्पण में देख-देख,मैंने सुलझाए तिमिर केश।
गूँथे चुन तारक पारिजात,अवगुंठन कर किरणें अशेष।
छायावाद और प्रकृति का अन्योन्याश्रित संबंध रहा है। महादेवी जी के अनुसार- ‘छायावाद की प्रकृति, घट-कूप आदि से भरे जल की एकरूपता के समान अनेक रूपों से प्रकट एक महाप्राण बन गईं। स्वयं चित्रकार होने के कारण इन्होंने प्रकृति के अनेक भव्य तथा आकर्षक चित्र साकार किए हैं। महादेवी जी की कविता के दो कोण हैं- एक तो इन्होंने चेतनामयी प्रकृति का स्वतंत्र विश्लेषण किया है-‘
‘कनक से दिन मोती सी रात, सुनहली सांझ गुलाबी प्रात
मिटाता रंगता बारंबार कौन जग का वह चित्राधार?’
छायावादी काव्य में एक आध्यात्मिक आवरण तथा छाया रही है। अतः रहस्यवाद छायावादी कविता के प्रवृत्ति विशेष के लिए प्रयुक्त किया गया। महादेवी जी के अनुसार ‘रहस्य का अर्थ वहाँ से होता है जहाँ धर्म की इति है। रहस्य का उपासक ह्रदय में सामंजस्यमूलक परमतत्व की अनुभूति करता है और वह अनुभूति परदे के भीतर रखते हुए दीपक के समान अपने प्रशांत आभास से उसके व्यवहार को स्निग्धता देती हैं।’ महादेवी जी की रुचि सांसारिक भोग की अपेक्षा आध्यात्मिकता की ओर अधिक दर्शित होती हैं। रहस्यानुभूति की पाँच अवस्थाएँ इनके काव्य में लक्षित होती हैं। जिज्ञासा, आस्था, अद्वैतभावना, प्रणयानुभूति विरहानुभूति।
महादेवी जी में उस परमत्व को देखने की, जानने की निरंतर जिज्ञासा रही हैं। वह कौतूहल से पूछती हैं-
‘कौन तुम मेरे ह्रदय में
कौन मेरी कसक में नित मधुरता भरता अलक्षित?’
आत्मा और परमात्मा के अद्वैतत्व के लिए ‘बीन और रागिनी’ का प्रतीक इनकी अभिनव कल्पना एक सुंदर उदाहरण है। इनकी यह भावना कोरे दार्शनिक ज्ञान या तत्व चिंतन पर आधारित नहीं है अपितु उसमें ह्रदय का भावात्मक योग भी लक्षित होता है-
‘मैं तुमसे हूँ एक-एक है जैसे रश्मि प्रकाश
मैं तुमसे हूँ भिन्न-भिन्न ज्यों घन से तड़ित विलास।’
स्वाधीनता प्राप्ति के बाद 1952 में महादेवी जी उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्या मनोनीत की गईं। 1956 में भारत सरकार ने इनकी साहित्यिक सेवा के लिए ‘पद्म भूषण’ की उपाधि और 1969 में विक्रम विश्वविद्यालय ने इन्हें डी.लिट. की उपाधि से अलंकृत किया। इससे पूर्व इनको ‘नीरजा’ के लिए 1934 में ‘सक्सेरिया पुरस्कार’, 1942 में ‘स्मृति की रेखाओं’ के लिए ‘द्विवेदी पदक’ प्राप्त हुए। 1943 में इन्हें ‘मंगला प्रसाद पुरस्कार’ एवं उत्तर प्रदेश सरकार के ‘भारत भारती’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ‘यामा’ नामक काव्य संकलन के लिए इन्हें भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्राप्त हुआ।
इन्हें आधुनिक साहित्य की मीरा के नाम से जाना जाता है।
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