निराला जी के जन्म जयंती पर

निराला जी और उनका गद्य

      अपने साहित्य में राष्ट्रीय अस्मिता, दीन दुखियों, शोषितों, पीड़ितों, भिखारियों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं के प्रति अपनी पीड़ा व्यक्त करने वाले तथा सत्ता सामंतों, पाखंडों, अंधविश्वास, रूढि़वादी व्यवस्था के प्रति संघर्ष का शंखनाद करने वाले हिंदी साहित्य जगत के शब्द शिल्पी महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का 117वाँ जन्म दिवस बसंत पंचमी को साहित्यिक मंचों पर मनाया जा रहा है। इस उपलक्ष्य में आज मैं “निराला और उनका गद्य” इस विषय पर अपने विचार प्रकट करना चाहता हूँ ।

सन् 1896 की वसंत पंचमी के दिन जन्मे महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ पर माँ सरस्वती का विशेष आशीर्वाद था। निराला जी के कहानी संग्रह ‘लिली’ में आपकी जन्मतिथि 21 फरवरी 1899 ही अंकित है। वसंत पंचमी पर उनका जन्मदिन मनाने की परंपरा 1930 में प्रारंभ हुई।

निरालाअपने आपमें एक समाज; अपने आपमें सम्पूर्णता; अपने आपमें कविता या कहें कि अपने आपमें ही सम्पूर्ण साहित्य संसार थे। निरालामात्र नाम के ही निराला नहीं थे वरन् उनकी शैली, उनकी अभिव्यक्ति, उनका लेखन सभी कुछ तो निराला कहा जा सकता है। हिन्दी काव्य को नया आयाम देने वाले महाकवि महाप्राण निराला हिन्दी के प्रथम कवि कहे जा सकते हैं जिन्होंने आधुनिक कविता को जन्म दिया।

      हिन्दी साहित्य के सर्वाधिक चर्चित साहित्यकारों मे से एक सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है निराला जी एक कवि, उपन्यासकार, निबन्धकार और कहानीकार थे। उन्होंने कई रेखाचित्र भी बनाये। उनका व्यक्तित्व अतिशय विद्रोही और क्रान्तिकारी तत्त्वों से निर्मित हुआ है।  ‘निराला’ अपने साहित्य कर्म में इतने निराले रहे कि उन्होंने साहित्य में एक अत्यंत निराली परंपरा का ही निर्माण कर डाला। वे मानव, समाज, राजनीति, साहित्य आदि को बंधन-मुक्त, करने हेतु आजीवन संघर्ष करते रहे। समस्त प्रकार के अवांछनीय बंधनों को तोडऩे का श्रीगणेश सन 1932 में ‘तोड़ती पत्थर’ से हुआ था। इससे पूर्व लोकप्रसिद्ध नायक-नायिकाओं, राजा-महाराजाओं,वीर पुरूषों अथवा श्रेष्ठ पात्रों पर ही काव्य-सृजन किया जाता था। वे हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। अपने समकालीन अन्य कवियों और गद्यकारों से अलग उन्होंने कविता और गद्य में कल्पना का सहारा बहुत कम लिया है और यथार्थ को प्रमुखता से चित्रित किया है। वे हिन्दी में मुक्तछंद के प्रवर्तक भी माने जाते हैं। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की गद्यकला की सबसे बड़ी विशेषता है चित्रण-कौशल। आंतरिक भाव हो या बाह्य जगत के दृश्य-रूप, संगीतात्मक ध्वनियां हो या रंग और गंध, सजीव चरित्र हों या प्राकृतिक दृश्य, सभी अलग-अलग लगनेवाले तत्त्वों को घुला-मिलाकर निराला ऐसा जीवंत चित्र उपस्थित करते हैं कि पढ़ने वाला उन चित्रों के माध्यम से ही निराला के मर्म तक पहुँच सकता है। निराला के चित्रों में उनका भावबोध ही नहीं, उनका चिंतन भी समाहित रहता है। इसलिए उनकी बहुत-सी गद्य और कविताओं में दार्शनिक गहराई उत्पन्न हो जाती है। इस नए चित्रण-कौशल और दार्शनिक गहराई के कारण अक्सर निराला के गद्य और कविताएँ कुछ जटिल हो जाते हैं, जिसे न समझने के नाते विचारक लोग उन पर दुरूहता आदि का आरोप लगाते हैं। उनके किसान-बोध ने ही उन्हें छायावाद की भूमि से आगे बढ़कर यथार्थवाद की नई भूमि निर्मित करने की प्रेरणा दी। विशेष स्थितियों, चरित्रों और दृश्यों को देखते हुए उनके मर्म को पहचानना और उन विशिष्ट वस्तुओं को ही चित्रण का विषय बनाना, निराला के यथार्थवाद की एक उल्लेखनीय विशेषता है। निराला पर अध्यात्मवाद और रहस्यवाद जैसी जीवन-विमुख प्रवृत्तियों का भी असर है। इस असर के चलते वे बहुत बार चमत्कारों से विजय प्राप्त करने और संघर्षों का अंत करने का सपना देखते हैं। निराला की शक्ति यह है कि वे चमत्कार के भरोसे अकर्मण्य नहीं बैठ जाते और संघर्ष की वास्तविक चुनौती से आँखें नहीं चुराते। कहीं-कहीं रहस्यवाद के फेर में निराला वास्तविक जीवन-अनुभवों के विपरीत चलते हैं। हर ओर प्रकाश फैला है, जीवन आलोकमय महासागर में डूब गया है, इत्यादि ऐसी ही बातें हैं।

निरालाजी रवीन्द्रनाथ टैगोर, तुलसीदास और गालिब के भक्त थे। लेकिन वे रवीन्द्रनाथ को विश्व का सर्वश्रेष्ठ कवि नहीं मानते थे। उनकी नजरों में सर्वश्रेष्ठ तो तुलसी ही थे।

कविता की पुष्टि और परिपक्व अनुगूँज हिन्दी काव्य जगत् में परिभ्रमण करती रही साथ ही निराला की साहसिक लेखनी निरन्तर साहित्य के प्रत्येक बिन्दुओं का स्पर्श करती रही। मुक्त रहने की भावना से ओत-प्रोत निराला ने स्वयं को मात्र कविता के सांचे में नहीं बाँधे रखा वरन् गद्य के भी प्रत्येक पहलू को अपनाने का प्रयास किया । निबन्ध, आलोचना, कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता, पत्र-साहित्य आदि को भी निराला ने निराली अभिव्यक्ति प्रदान की।

     अप्सरा, अलका ,प्रभावती, निरुपमा , कुल्लीभाट, चमेली, इन्दुलेखा, लिली, काले कारनामे, सखी आदि के माध्यम से निराला ने गद्य में भी अपनी गहराई को दर्शाया है। उनके उपन्यासों और कहानियों में निराला धरती से जुड़े मूल यथार्थ को सामने लाते रहे हैं। मानव मूल्य चेतना को हमेशा दृष्टिगत रखने वाले निराला की पारखी नजर से सामाजिक यथार्थ कदापि अछूता नहीं रह सकता था। निराला जी ने समाज की लघुतम इकाई को देखकर पूरी महत्ता के साथ उसे समाज के सामने प्रस्तुत किया है। ‘अप्सरा’ में मूलतः वेश्या समस्या को निराला ने उठाया है। निराला की सोच कि आदमी आदमी है और शास्त्रानुसार सभी एक परमात्मा की सन्तान हैं; इसी कारण वे वेश्यापुत्री कनक का विवाह राजकुमार जैसे कुलीन व्यक्ति से करवाते हैं। इसी प्रकार ‘अलका’ में भी निराला ने जीवन की यथार्थता को गुम नहीं होने दिया है। नारी की दिव्यता और उज्ज्वलता का चित्रण मनोयोग से करते हुए निराला जी का प्रगतिशील दृष्टिकोण अधिक मुखरित हुआ है। सामाजिक नीतियों, व्यवस्थाओं को सामने रखकर  निराला ने जहाँ सामाजिक समस्याओं पर कुठाराघात किया है वहीं इन पर व्यंग्य भी किया है। जमींदारों का अत्याचार, ग्रामीण जीवन की संकीर्णता, सामाजिक रूढ़ियों आदि को ‘निरुपमा’ में दर्शाया गया है। सशक्त चित्रण में सिद्धहस्त रहे निराला ने अपने कथा साहित्य के द्वारा समस्याओं को सामने लाकर सामाजिक यथार्थ को ही प्रस्तुत किया है। जैसा कि निराला ने स्वयं ही स्वीकारा है कि ‘सत्य की कसैली अनुभूति को उजागर करने की अपेक्षा उन्होंने विधिवत् हास्य का सहारा लेकर ब्राह्मणों की अपने ‘पुरख्यातम् परम्परा’ का बड़ा सही जन्मांक प्रस्तुत किया है।  ‘चतुरी चमार’ को जूते गाँठने का काम देकर भी निराला ने उसके साहित्य सत्संग को किन्हीं चतुर्वेदियों से ऊपर माना है, समाज की जातिगत, क्षेत्रगत तथा व्यक्तियों को हीन मानने वाली व्यवस्था के विरुद्ध खुलकर लिखने का कार्य निराला जैसा लेखक ही कर सकता था। ‘चोरी की पकड़’ में वे जटाशंकर ब्राह्मण की कलई एक कहारिन द्वारा यह कहलवा कर खोलते हैं कि ‘होंठ से होंठ चाटते तुम्हारी जात नहीं गयी।’ जमीदारों, ब्राह्मणों, अफसरों के शोषण को दर्शाते निराला कहीं-कहीं स्वयं अपने जीवन का अभाव, अपने जीवन की बिडम्बना का उद्घाटन करते नजर आये हैं। सामाजिक अन्याय का विरोध, आर्थिक उत्पीड़न और सामाजिक भेदभाव का विरोध भी निराला मुखर होकर करते नजर आये हैं। वस्तुतः निराला का कथा साहित्य उनकी दोहरी चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। कवि स्वभाव के कारण वे मुक्तता के अभिलाषी रहे, सौन्दर्य, प्रेम और भावुकता की बात करते दिखे वहीं सामाजिक जीवन की रूढ़िग्रस्त नैतिकता के विरोधी भी रहे। इसके अतिरिक्त दूसरी ओर संघर्षशील और यथार्थवादी प्रवृत्तियों को वे महत्व देते हैं और रोमांसप्रियता से सामाजिक यथार्थ की ओर प्रवृत्त होते हैं। कहा जाये तो निराला के उपन्यासों की प्रगतिशीलता की ओर आलोचकों की निगाह अभी विवेचनात्मक रूप में नहीं गई है। निराला जी की समालोचनात्मक दृष्टि सामाजिक यथार्थ को उघाड़ देने की प्रवृत्ति से निर्वेक्तिक शैली में उनकी कला को उच्चतम स्तर तक पहुँचाया है। उनके गद्य साहित्य में चाहे वह उपन्यास हो, कहानी हो या निबन्ध हो सभी में सुरुचि, दृष्टि की विराटता, यथार्थ की परख, ग्रामीण परिवेश को सजीव बनाने की क्षमता, निर्भीकता आदि तत्वों का समावेश मिलता है। इतने पर भी लगता है कि इन सब पर उनका कवि रूप ज्यादा भारी पड़ा है और जनमानस उसी से अभिभूत होता रहा है। काव्यत्व के साथ यदि निराला का गद्यकार स्वरूप-कथाकार, आलोचक-भी पाठकों ने समझा होता तो शायद निराला मात्र कवि रूप में अग्रगण्य न होते; उनका गद्यकार स्वरूप भी लोगों को अभिभूत करता रहता।

भारत के पूर्व प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू उनसे इस कदर प्रभावित थे कि एक सभा में स्वयं को पहनायी गयी माला निरालाजी के गले में डालकर कहा था कि इस महाप्राण के रहते मुझे माला पहनना शोभा नहीं देता।
निराला की मौलिकता, लोकमानस के हृदय पटल पर छा जाने वाली जीवन्त व प्रभावी शैली, अद्भुत वाक्य विन्यास और उनमें अन्तर्निहित गूढ़ अर्थ उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करते हैं। बसंत पंचमी और निराला का सम्बन्ध बड़ा अद्भुत रहा है और बसंत पंचमी के दिन हर साहित्यकार उनके सानिध्य की अपेक्षा रखता था। ऐसे महाविभूति को हर वर्ष वसंत पंचमी के दिन सभी हिंदी प्रेमियों ने याद किया है और आगे भी याद करते रहेंगे। जयहिंद ।

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