मेरी कलम से कुछ शब्द

प्रश्न हैं मेरे मन में,

अंत कभी होते नहीं ।

सोचते हैं जवाब में,

बंद कभी होते नहीं ॥

दिमाग की बत्ती जलते ही,

बुझने का कोई नाम नहीं ।

मानव के ही शब्दकोश में,

“असंभव” शब्द का स्थान नहीं ॥

जीवन-मरण के सत्य को,

मानना ही बुद्धिमत्ता है ।

जीवनरूपी युद्ध-क्षेत्र में,

प्रेम बिना, जो निहत्था है ॥

विज्ञान कितना ही विकास कर ले,

मरण को रोक सकते नहीं ।

होना है जो, वह होकर रहेगा,

कभी उसे बदल सकते नहीं ॥

द्वारा

आर.बाबूराज जैन   टी.जी.टी. (हिंदी) ज.न.वि.पुदुच्चेरी

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This entry was posted on 29/08/2016. 1 Comment

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद : एक परिचय

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद या अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन (11 नवंबर, 1888 – 22 फरवरी, 1958) एक प्रसिद्ध भारतीय मुस्लिम विद्वान थे। वे कवि, लेखक, दार्शनिक, पत्रकार और भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे। इन सबसे बढ़कर अपने समय के धर्म के एक महान् विद्वान् थे। महात्मा गांधी की तरह भारत की भिन्न-भिन्न जातियों के बीच, विशेष तौर पर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच एकता के लिए कार्य करने वाले कुछ महान् लोगों में से वे भी एक थे। अपने गुरु की तरह उन्होंने भी जीवन भर दो दुश्मनों ब्रिटिश सरकार और हमारे राष्ट्र की एकता के विरोधियों का सामना किया। खिलाफत आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1923 में वे भारतीय नेशनल काग्रेंस के सबसे कम उम्र के प्रेसीडेंट बने। स्वतंत्रता के बाद वे भारत सरकार के पहले शिक्षा मंत्री बने और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना में उनके सबसे अविस्मरणीय कार्यों में से एक था। उन्हें ‘मौलाना आज़ाद’ के नाम से जाना जाता है। ‘आज़ाद’ उनका उपनाम है।

जन्म

अबुल के पिता ‘मौलाना खैरूद्दीन’ एक विख्यात विद्वान् थे, जो बंगाल में रहते थे। उनकी माँ ‘आलिया’ एक अरब थी और मदीन के शेख़ मोहम्मद ज़ाहिर वत्री की भतीजी थी। अरब देश के पवित्र मक्का में रहने वाले एक भारतीय पिता और अरबी माता के घर में उनका जन्म हुआ। पिता मौलाना खैरूद्दीन ने उनका नाम मोहिउद्दीन अहमद रखा। आगे चलकर वे ‘मौलाना अबुल कलाम आज़ाद’ या ‘मौलाना साहब’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। बचपन से ही उनमें कुछ ख़ास बातें नज़र आने लगी थीं, जो जीवन भर उनके साथ रहीं। मौलाना आज़ाद को एक ‘राष्ट्रीय नेता’ के रूप में जाना जाता हैं।

एक मित्र को उन्होंने पत्र में लिखा था, “…..मैं राजनीति के पीछे कभी नहीं दौड़ा था। वस्तुतः राजनीति ने ही मुझे पकड़ लिया…..”।

स्वतंत्र भारत के शिक्षा मंत्री

आज़ाद स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री थे और उन्होंने ग्यारह वर्षो तक राष्ट्र की नीति का मार्गदर्शन किया। भारत के पहले शिक्षा मंत्री बनने पर उन्होंने नि:शुल्क शिक्षा, भारतीय शिक्षा पद्धति, उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना की । मौलाना आज़ाद को ही ‘भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान’ अर्थात् ‘आई.आई.टी. और ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ की स्थापना का श्रेय है।वे संपूर्ण भारत में 10+2+3 की समान शिक्षा संरचना के पक्षधर रहे।

भारत रत्न

वर्ष 1992 में मरणोपरान्त मौलाना को भारत रत्न से सम्मानित किया गया। एक इंसान के रूप में मौलाना महान् थे, उन्होंने हमेशा सादगी का जीवन पसंद किया। उनमें कठिनाइयों से जूझने के लिए अपार साहस और एक संत जैसी मानवता थी। उनकी मृत्यु के समय उनके पास कोई संपत्ति नहीं थी और न ही कोई बैंक खाता था। उनकी निजी अलमारी में कुछ सूती अचकन, एक दर्जन खादी के कुर्ते पायजामें, दो जोड़ी सैडल, एक पुराना ड्रैसिंग गाऊन और एक उपयोग किया हुआ ब्रुश मिला किंतु वहाँ अनेक दुर्लभ पुस्तकें थी जो अब राष्ट्र की सम्पत्ति हैं।

मौलाना आज़ाद जैसे व्यक्तित्व कभी-कभी ही जन्म लेते हैं। अपने संपूर्ण जीवन में वे भारत और इसकी सम्मिलित सांस्कृतिक एकता के लिए प्रयासरत रहे।

राष्ट्रीय शिक्षा दिवस

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के जन्म दिवस 11 नवम्बर को ‘राष्ट्रीय शिक्षा दिवस’ घोषित किया गया है। उनकी अगुवाई में ही 1950 के शुरुआती दशक में ‘संगीत नाटक अकादमी’, ‘साहित्य अकादमी’ और ‘ललित कला अकादमी’ का गठन हुआ था। इससे पहले वह 1950 में ही ‘भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद’ बना चुके थे। हैदराबाद में उन्हीं के नाम पर ‘मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू युनिवर्सिटी’ स्थापित कर राष्ट्र की ओर से एक स्वतन्त्रता सेनानी, क्रान्तिकारी, पत्रकार, समाज सुधारक, शिक्षा विशेषज्ञ और अभूतपूर्व शिक्षा मंत्री को श्रृद्धांजली दी गयी है। हम भी अपने विद्यालय में ऐसे महान पुरुष याद करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं | जय हिन्द | जय मौलाना आज़ाद |

नम्रता और अभिमान

*पहाड़ चढ़ने वाला व्यक्ति झुककर चलता है और उतरने वाला अकड़ कर चलता है |*

*कोई अगर झुककर चल रहा है मतलब ऊँचाई पर जा रहा है और कोई अकड़ कर चल रहा है, मतलब नीचे जा रहा है |*

*”अभिमान”की ताकत फरिश्तो को भी”शैतान”बना देती है,और*
*”नम्रता”साधारण व्यक्ति को भी “फ़रिश्ता”बना देतीहै।*

नवोदय : एक परिचय

नवोदय : एक परिचय

नवोदय नवोदय नवोदय,

विद्यालय का नाम है नवोदय ।

पूरे भारत में है नवोदय,

हरेक जिला में है नवोदय ॥

 

विद्यालयों का आदर्श है नवोदय,

संपूर्ण विकास का नाम है नवोदय ।

राष्ट्रीय एकता का सूत्रधार है नवोदय,

विद्या का स्रष्टा है नवोदय ।।

 

सहशिक्षा का साम्राज्य है नवोदय,

आवासीय विद्यालय है नवोदय ।

पर्यावरण के गोद में है नवोदय,

गरीबों का वर-प्रसाद है नवोदय ॥

 

नवाचार का प्रतिनाम है नवोदय,

ज्ञान का विस्तारक है नवोदय।

जाति-धर्म से परे है नवोदय,

गुरुकुल परंपरा का उदाहरण है नवोदय॥

 

 

राजीव गांधी के दिमाग की उपज है नवोदय,

गाँवों के प्रतिभाशालियों का उद्धारक है नवोदय ।

खेद-कूद, गीत-संगीत का भर-मार है नवोदय,

अत्याधुनिक साधनों का भंडार है नवोदय ॥

 

त्रिभाषा सूत्र का परिचायक है नवोदय,

भारतीय संस्कृति का संरक्षक है नवोदय ।

विद्यालयों में अग्रगण्य है नवोदय,

एक छोटा हिंदुस्तान है नवोदय ॥

आर.बाबूराज जैन

टी.जी.टी.(हिंदी)

जवाहर नवोदय विद्यालय, पुदुच्चेरी

 

 

आकाशवाणी,पुदुच्चेरी में प्रसारित मेरा भाषण ” महाकवि जयशंकर प्रसाद की कामायनी”

जयशंकर प्रसाद की कामायनी

   हिंदी साहित्य के विशाल सागर में छायावाद युग की रचनाओं में सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में महाकवि जयशंकर प्रसाद जी की कामायनी मानी जाती है । कामायनी हिंदी भाषा का एक महाकाव्य है। प्रौढ़ता के बिन्दु पर पहुँचे हुए कवि की यह अन्यतम रचना है। इसे महाकवि जयशंकर प्रसाद जी के सम्पूर्ण चिंतन- मनन का प्रतिफलन कहना अधिक उचित होगा। इसका प्रकाशन 1936 ई. में हुआ था। हिन्दी साहित्य में आचार्य तुलसीदास जी की ‘रामचरितमानस’ के बाद हिन्दी का दूसरा अनुपम महाकाव्य ‘कामायनी’ को माना जाता है। यह ‘छायावादी युग’ का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है। इसे छायावाद का ‘उपनिषद’ भी कहा जाता है । ‘कामायनी’ के नायक मनु और नायिका श्रद्धा हैं। इस काव्य की कथावस्तु वेद,  उपनिषद, पुराण आदि से प्रेरित है किंतु मुख्य आधार शतपथ ब्राह्मण को स्वीकार किया गया है। आवश्यकतानुसार जयशंकर प्रसाद जी ने पौराणिक कथा में परिवर्तन कर उसे न्यायोचित रूप दिया है।

‘कामायानी’ की कथा वस्तु संक्षेप में इस प्रकार है- पृथ्वी पर घोर जलप्लावन आया और उसमें केवल मनु जीवित रह गये। वे देवसृष्टि के अंतिम अवशेष थे। जलप्लावन समाप्त होने पर उन्होंने यज्ञ आदि करना आरम्भ किया। एक दिन ‘काम पुत्री’ ‘श्रद्धा’ उनके समीप आयी और वे दोनों साथ रहने लगे। भावी शिशु की कल्पना में निमग्न श्रद्धा को एक दिन ईष्यावश मनु अनायास ही छोड़ कर चले गए । उनकी भेंट सारस्वत प्रदेश की अधिष्ठात्री  इड़ा’ से हुई। उसने इन्हें शासन का भार सौंप दिया। पर वहाँ की प्रजा एक दिन इड़ा पर मनु के अत्याचार और आधिपत्य- भाव को देखकर विद्रोह कर उठी। मनु आहत हो गये तभी श्रद्धा अपने पुत्र मानव के साथ उन्हें खोजते हुए आ पहुँची किंतु पश्चात्ताप में डूबे मनु पुन: उन सबको छोड़कर चले गए । श्रद्धा ने मानव को इड़ा के पास छोड़ दिया और अपने मनु को खोजते- खोजते उनसे जा मिली । अंत में सारस्वत प्रदेश के सभी प्राणी कैलास पर्वत पर जाकर श्रद्धा और मनु के दर्शन करते हैं।

‘कामायनी’ की कथा पन्द्रह सर्गों में विभक्त है, जिनका नामकरण चिंता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा आदि मनोविकारों के नाम पर हुआ है। ‘कामायनी’ आदि मानव की कथा तो है ही, पर इसके माध्यम से कवि ने अपने युग के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार भी किया है। कामायनी में मनु मन का प्रतीक है और श्रद्धा हृदय तथा इड़ा बुद्धि का प्रतीक है। अपने आंतरिक मनोविकारों से संघर्ष करता हुआ मनु श्रद्धा याने विश्वास की सहायता से आनन्द लोक तक पहुँचता है। प्रसाद जी ने समरसता सिद्धांत तथा समन्वय मार्ग का प्रतिपादन किया है। अंतिम चार सर्गों में शैवागम का प्रभाव है।

‘कामायनी’ एक विशिष्ट शैली का महाकाव्य है। उसका गौरव उसके युगबोध, परिपुष्ट चिंतन, महत्त्वपूर्ण उद्देश्य और प्रौढ़ शिल्प में निहित है। काव्य रूप की दृष्टि से कामायनी चिंतनप्रधान है, जिसमें कवि ने मानव को एक महान्‌ संदेश दिया है। ‘तप नहीं, केवल जीवनसत्य’ के रूप में कवि ने मानव जीवन में प्रेम की महानता का प्रतिपादन किया है। यह जगत्‌ कल्याणभूमि है, यही श्रद्धा की मूल स्थापना है। इस कल्याणभूमि में प्रेम ही एकमात्र श्रेय और प्रेय है। इसी प्रेम का संदेश देने के लिए कामायनी का अवतार हुआ है। प्रेम मानव और केवल मानव की विभूति है। मानवेतर प्राणी, चाहे वे चिरविलासी देव हों, चाहे असुर हों, चाहे दैत्य या दानव हों, चाहे पशु हों, प्रेम की कला और महिमा वे नहीं जानते, प्रेम की प्रतिष्ठा केवल मानव ने की है। परंतु इस प्रेम में सामरस्य की आवश्यकता है।

युग प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद जी और आचार्य अभिनवगुप्त के काल के बीच लगभग एक हजार वर्ष का अंतर है। यह अंतर भौगोलिक स्तर पर भी है। लेकिन, दोनों में एक अद्भुत साम्य है, वह है उनकी विचार-पीठिका । अभिनवगुप्त का प्रभाव सैकड़ों वर्ष बाद भी जयशंकर प्रसाद जी की कलम से प्रस्फुटित हो रहा है। जयशंकर प्रसाद जी का महाकाव्य ‘कामायनी’ अभिनवगुप्त के ‘प्रत्यभिज्ञा दर्शन’ का ही एक काव्य रूप है। कामायनी ग्रंथ का सार शैव दर्शन के आनंदवाद पर आधारित है। चिंता से आनंद तक पहुंचना कैसे संभव हो, यही कामायनी का मूल प्रतिपाद्य है। कामायनी छायावाद की उत्कृष्ट रचना है। विचारकों का मानना है कि इसका निर्माण छायावाद की प्रौढ़ बेला में हुआ है और यह छायावाद के प्रवर्तक महाकवि जयशंकर प्रसाद की गहन अनुभूति और उन्नत अभिव्यक्ति की साकार प्रतिमा है। इस कारण इसमें छायावाद की संपूर्ण उन्नत और श्रेष्ठ प्रवृत्तियों का मिलना नितांत स्वाभाविक है।

डॉ नगेंद्र ने माना है कि कामायनी परंपरागत महाकाव्य यानी ऐहिक जीवन-प्रधान महाकाव्य की कोटि में नहीं आता। वह ऐहिक जीवन का महाकाव्य नहीं है, मानवचेतना का महाकाव्य है। कामायनी मानव-चेतना के विकास का महाकाव्य है या मानव सभ्यता के विकास का विराट रूपक है। इसलिए इसका अध्ययन साफतौर पर उसके रसास्वादन की प्रक्रिया का एक अंग है। कामायनी के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मानना है कि किसी एक विशाल भावना को रूप देने की ओर भी अंत में प्रसादजी ने ध्यान दिया, जिसका परिणाम है कामायनी, इसमें उन्होंने अपने प्रिय आनंदवाद की प्रतिष्ठा दार्शनिकता के ऊपरी आभास के साथ कल्पना की मधुमती भूमिका बनाकर की है। कामायनी छायावाद की चरम परिणति है और प्रसाद के गंभीर चिंतन का श्रेष्ठतम प्रतिफल है।

मानवता की आधारशिला पर टिका हुआ यह महाकाव्य एक तरफ जहां श्रद्धा और मनु के माध्यम से सृष्टि के विकास की कहानी कहता है, वहीं दूसरी तरफ रूपकों के माध्यम से मानवता के चरम विकास को भी मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक धरातल पर प्रस्तुत करता है। बीसवीं शताब्दी की महान उपलब्धि के रूप में कामायनी दार्शनिक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक और कलात्मक विशिष्टता का एक बेजोड़ संगम है। कामायनी एक सफल कृति है जिसमें जीवन की ज्वलंत समस्याओं का अद्भुत और सटीक समाधान प्रस्तुत किया गया है। कामायनी काव्य का मूलबिंदु है- पहले श्रद्धा को पत्नी रूप में ग्रहण करना। फिर उसे अकेली छोड़कर इड़ा के साथ मनु का रहना। इड़ा को दासी या वंदिनी बनाने का प्रयास करने पर देवों का कोपभाजन बनना।

जीवन का अंतिम भाव आनंद है । आनंद की उपलब्धि के लिए प्रयत्नशील मानव अनेक संघर्षों से गुजरता है। आनंद सर्ग के निर्माण में प्रसादजी ने शैवदर्शन का अत्यधिक आश्रय लिया है। शैवागम के प्रत्यभिज्ञा दर्शन से ही प्रसाद ने समरसता सिद्धांत की परिकल्पना की। शैवदर्शन के अनुसार शिव आनंदस्वरूप हैं। कामायनी में श्रद्धा की शक्ति के रूप में परिकल्पना की गई। कश्मीरी शैवागम प्रधानतया अद्वैतवादी है जहां पर परम अद्वैत सत्ता आत्मा है जिसको शिव परमेश्वर के नाम से भी विभूषित किया जाता है।

महाकवि प्रसाद जी  का ‘आनंदवाद’ सर्ववाद सिद्धांत पर टिका हुआ है जिसे हम वैदिक अद्वैत के रूप में भी समझ सकते हैं। प्रसादजी का यह सर्ववादी सिद्धांत आचार्य शंकर द्वारा प्रवर्तित अद्वैत सिद्धांत से पूर्णतया भिन्न है। उन्होंने शैवागम के सर्ववादमूलक आनंदवाद को ग्रहण किया। आनंदवादी आचार्य अभिनवगुप्त जिस प्रकार एक ही अभेदमय आनंद रस को मूल रस मानते हैं, वैसे ही कामायनीकार की आस्था भी शैवागम के आनंद रस से प्रभावित इसी एकरस सिद्धांत में थी।

महाकवि प्रसादजी मूलत: एक दार्शनिक रहस्यवादी कवि हैं। वे अपनी रचनाओं में इस जीवन के सत्य रहस्य को प्रमुखता से स्वीकार करते हैं। यही रसमय रूप सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उसमें कला और सत्य दोनों की अद्वैतता विद्यमान है। उनका काव्यदर्शन विशुद्ध ध्वनिवादी है। दार्शनिक रहस्य और ध्वनि एक दूसरे पर परस्पर आश्रित हैं। काव्य का अभीष्ट रस आनंद ही है जिसे काव्य की आत्मा भी माना गया है।

अंत में हम कह सकते हैं कि हिंदी भाषा के उद्यान में महाकवि जयशंकर प्रसाद जी एक ऐसे पुष्प हैं जो माधुर्य, सौंदर्य और सुगंध से भरपूर हैं। माधुर्य के कारण उनकी रचनाएँ मिष्ट हैं। सौंदर्य के कारण उनकी रचनाएँ शिष्ट हैं। सुगंध के कारण उनकी रचनाएँ विशिष्ट हैं। माधुर्य, उनकी रचनाओं का शिवम्‌ है। सौंदर्य, , उनकी रचनाओं का सुंदरम्‌ है। सुगंध, , उनकी रचनाओं का सत्यम्‌ है। इस प्रकार इन तीनों का समागम इनकी रचनाओं में देख सकते हैं ।

एन.सी.सी.में कैडेट बनना

सत्य का मार्ग दिखाने, अनुशासन की शिक्षा लेने,

             कर्तव्य का पालन करने, एन.सी.सी.में कैडेट बनना ।

संस्कृति व सभ्यता को समझने, चरित्र का निर्माण करने,

             साहस का विकास करने, एन.सी.सी.में कैडेट बनना ।

नेतृत्व की क्षमता बढ़ाने, सेवा का भाव जगाने,

            उपयोगी नागरिक बनने, एन.सी.सी.में कैडेट बनना ।

मानव संसाधन निर्मित करने, प्रकृति का संरक्षण करने,

           राष्ट्र की सेवा करने, एन.सी.सी.में कैडेट बनना ।

देश की एकता को बढ़ावा देने, भाईचारे का पाठ पढ़ने,

           सपनों के भारत को सत्य बनाने, एन.सी.सी.में कैडेट बनना ।

सुनिश्चित लक्ष्य हासिल करने, स्वच्छता का प्रचार करने,

          मानव-मूल्य का पहचान करने, एन.सी.सी.में कैडेट बनना ।

सभी धर्मों का आदर करने, अनुशासित और देशभक्त बनने,

          उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने, एन.सी.सी.में कैडेट बनना ।

 

रचयिता :

आर.बाबूराज जैन/ S/O R.BABURAJ JAIN

टी.जी.टी.(हिंदी) &  अतिरिक्त एन.सी.सी. अधिकारी/TGT(HINDI) & ANO

जवाहर नवोदय विद्यालय, कालापेट (पुदुच्चेरी)/ JAWAHAR NAVODAYA VIDYALAYA,KALAPET (PUDUCHERRY)